नीट परीक्षा में नाकामी के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र की मांग को लेकर जंतर-मंतर धरना पूरी तरह से संविधान सम्मत था, लेकिन उसके बाद भीड़ के दबाव में एफआईआर, जमानत और गिरफ्तारी के बढ़ते चलन से कानून के शासन पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं? कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन के दौरान कई राज्यों की पुलिस ने सैकड़ों एफआईआर दर्ज की थी। सीजेपी की धमकी के बाद केंद्र सरकार ने समझौते के तहत सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई, जिसके अनुसार दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और महाराष्ट्र राज्यों में दर्ज 129 एफआईआर को चीफ जस्टिस की पीठ ने तुरंत रद्द कर दिया। एफआईआर करवाने, धाराओं में बदलाव या गलत एफआईआर रद्द करवाने के लिए पुरानी सीआरपीसी और नए बीएनएसएस कानून में विस्तृत प्रावधान हैं।
पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के अनुसार, ट्रायल कोर्ट या फिर हाईकोर्ट से हर राज्य में दर्ज एफआईआर रद्द हो सकती थी। अनुच्छेद-142 की विशिष्ट शक्तियों के इस्तेमाल से संबंधित पक्षकारों को सुने बगैर आपराधिक मुकदमों को रद्द करने के फैसले से पुलिस और न्यायिक व्यवस्था में भीड़ तंत्र के हावी होने का खतरा है।
सोशल मीडिया पोस्ट और राजनीतिक बयानबाजी पर मानहानि का मुकदमा किया जा सकता है, लेकिन नेतागण राज्यों में अपनी पार्टी की सरकार के माध्यम से पुलिस में एफआईआर दर्ज कराने पर ज्यादा जोर देने लगे हैं। हल्द्वानी शुद्धीकरण विवाद में कांग्रेस के आदिवासी नेता की शिकायत पर कर्नाटक में जीरो एफआईआर और उत्तराखंड में राहुल गांधी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हुई है। जनता के अखाड़े के बजाय थानों में सियासी लड़ाई से बेवजह की मुकदमेबाजी बढ़ने के साथ न्यायिक प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है। सीजेपी के नेता संविधान की दुहाई देते हैं। जंतर-मंतर आंदोलन खत्म होने के बाद दावा किया गया था कि पीड़ित लोगों की मदद के लिए वकीलों का ग्रुप बनाया जाएगा। लेकिन स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ पॉक्सो और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं को जोड़ने और उसकी गिरफ्तारी के लिए सीजेपी ने भीड़ के माध्यम से दिल्ली पुलिस पर दबाव बनाया। उसके जवाब में स्वतंत्र की तरफ से कई संगठन हिंदू भावनाओं को आहत करने के मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। पुलिस, अदालतों और सरकारी तंत्र में रसूखदारों और पैसे वालों का वर्चस्व है। अगर राजनीतिक दबाव और पक्षकारों के प्रभाव के अनुसार पुलिस कार्रवाई और अदालतों में फैसले होंगे, तो आम जनता का न्यायिक प्रक्रिया पर से भरोसा और कमजोर होगा।
जिला अदालतों में लंबित आपराधिक मुकदमों में फंसे अधिकांश गरीब और वंचित वर्ग के लोग पुलिस ज्यादती का शिकार हैं। आपराधिक मुकदमों में नए तरह की विसंगति बढ़ रही है। एफआईआर दर्ज करने या रद्द करने के बारे में थाने के बजाय नेताओं के इशारे पर पुलिस की कार्रवाई या चुप्पी गलत है, जिसे जिला स्तर पर ही रोका जाना चाहिए। कानून की किताबों में जिला जज को फांसी देने का अधिकार है, लेकिन चर्चित मामलों में जमानत और मुकदमे रद्द करने का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट में होने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, जघन्य आपराधिक पृष्ठभूमि वालों के खिलाफ मुकदमे जारी रह सकते हैं। दिल्ली पुलिस ने फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम के आधार पर दावा किया कि आंदोलन में 2,873 आपराधिक लोग जुड़े थे। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, उनमें से 25 लोग जेलों में बंद थे। इससे एफआरएस तकनीक की विश्वसनीयता के साथ पुलिस की जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दूसरी तरफ पुलिस के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने से प्रशासन का मनोबल कमजोर हो रहा है। न्याय शास्त्र के मूल सिद्धांत के अनुसार हजार आरोपी भले ही छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन आम जनता के खिलाफ एफआईआर दर्ज और गिरफ्तारी हो जाए, तो जमानत और मुकदमे में पूरा परिवार तबाह हो जाता है। अदालतों में लंबित 5.83 करोड़ मुकदमों में आपराधिक मामलों का पैटर्न और पिरामिड बेहद चिंताजनक है। जिला अदालतों में 78 फीसदी, हाईकोर्ट में 30.3 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 23 फीसदी आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। दिलचस्प बात यह है कि आपराधिक मुकदमों में अभियोजन पक्ष, न्यायालय, जेल, कानूनी सहायता सभी सरकारी खर्चे पर चल रहे हैं। नोएडा में श्रमिक आंदोलन में गिरफ्तार महिला आंदोलनकारी के खिलाफ दर्ज राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है, लेकिन उस आंदोलन से जुड़े सभी मुकदमों की विवेचना और ट्रायल एकसाथ किए जाने की याचिका खारिज हो गई है।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद-142 को परमाणु मिसाइल जैसा खतरनाक बताया था। सबरीमाला फैसले के बाद अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने कहा था कि अनुच्छेद-142 की विशिष्ट शक्तियों का कामधेनु की तरह इस्तेमाल गलत है। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ को ही अनुच्छेद 142 की विशिष्ट शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। सैकड़ों एफआईआर रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि पुलिस मनमाने तरीके से मुकदमा दर्ज करती है. गलत एफआईआर करवाने वाले शिकायतकर्ता और दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून में प्रावधान हैं, जिन पर अमल नहीं हो रहा।
सीजेपी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह फैसला बाध्यकारी नजीर नहीं माना जाएगा, लेकिन संविधान में समानता पर सर्वाधिक जोर है। इसलिए किसी भी मामले में सिविल विवाद को आपराधिक तरीके से हैंडल करना गलत है। तीन नए आपराधिक कानून और जन विश्वास कानून में इस बारे में विस्तृत प्रावधान हैं। बेवजह की मुकदमेबाजी खत्म होने से जीडीपी भी बढ़ सकती है। राजनीतिक दबाव में संविधान की अनदेखी करके गलत एफआईआर करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई संस्थागत सुधार के लिए जरूरी है। सीजेपी रजिस्टर्ड नहीं है, लेकिन उनके कार्यकर्ताओं से जुड़े सभी आपराधिक मामले निरस्त हो गए। अतः सभी पार्टियों के नेताओं के खिलाफ सियासी वजहों से दर्ज आपराधिक मामलों को निरस्त करने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। इससे लोकतंत्र के मंदिर में जनप्रतिनिधियों के आपराधिक दाग के कलंक में कमी आएगी।