कल सुबह नरेंद्र मोदी चौथी बार लाल किले के प्राचीर से देशवासियों को संबोधित करेंगे। इस बार भी वह अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाएंगे और यह बताएंगे कि निकट भविष्य में भारत को कौन-सी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। निजी तौर पर मेरी इच्छा है कि वह यह भी बताएं कि भारत में परिवर्तन लाना इतना कठिन क्यों है।
अन्य देश इतनी देर नहीं लगाते। वर्ष 1947 में जो देश हमसे पीछे हुआ करते थे, वे आज हमसे कहीं आगे निकल गए हैं। तूफानी रफ्तार से अगर कोई देश बदला है, तो वह चीन है। यहां यह कहना जरूरी है कि चीन की बागडोर मुट्ठी भर अधिकारियों के हाथ में है, सो परिवर्तन लाना आसान है। फिर भी चीन के शहरीकरण और विकास ने दुनिया को हैरान कर दिया है।
आज मैं उन दो जगहों के बारे में लिखूंगी, जिनमें परिवर्तन मैने अपनी आंखों से देखा है। ये हैं दुबई और थाईलैंड। मैं तीस-चालीस साल पूर्व जब पहली बार दुबई गई थी, तो वह एक छोटा, बदसूरत-सा शहर था, जिसमें एक ही बड़ी सड़क थी, जिस पर एक- दो होटल और दो-तीन रेस्टोरेंट थे। दुबई की अर्थव्यवस्था उन दिनों स्मगलिंग पर आधारित थी। मुंबई की तुलना में दुबई एक बड़ा गांव था।
अगली बार कोई पांच साल पहले दुबई जाना हुआ, तो ऐसा लगा कि मैं सिंगापुर या हांगकांग पहुंच गई हूं। भारत का एक भी शहर नहीं है, जो इतनी तेजी से परिवर्तित हुआ है। इसका जिक्र जब मैने केंद्र के एक आला अधिकारी से किया, तो उनका जवाब था, दुबई से तुलना नहीं हो सकती है भारत की। दुबई सिर्फ एक विशाल महानगर है और भारत एक विशाल देश।
पिछले तीस वर्षों में मैं थाईलैंड बहुत बार जा चुकी हूं और राजधानी बैंकाक से बाहर देहातों में घूमने का मौका बहुत बार मिला है। अपनी आंखों के सामने छोटे, गरीब और बेहाल गांवों को मैने सुंदर नगरों में परिवर्तित होते देखा है। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने , तब मैंने उनका समर्थन इस उम्मीद से किया कि कुछ ऐसा वह अपने देश में भी करके दिखाएंगे।
ऐसा नहीं है कि मोदी ने परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं किया है।
लाल किले से अपने हर भाषण में उन्होंने 'मेक इन इंडिया', 'स्किल इंडिया', 'स्वच्छ भारत', 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' जैसी योजनाओं की घोषणाएं की हैं, फिर भी भारत में परिवर्तन उसी सुस्त अंदाज से हो रहा है, जैसा होता रहा है। सो क्या इस बार प्रधानमंत्री अपने भाषण में देशवासियों को बताएंगे कि उनके नेक इरादों में कौन-सी बाधाएं हैं? बड़ी बाधाएं खड़ी करते हैं हमारे आला अधिकारी। किसी छोटे गांव में भी अगर कोई छोटी-मोटी सड़क या किसी नए स्कूल या अस्पताल का निर्माण तब तक नहीं हो सकता, जब तक कलेक्टर साहब की इजाजत न हो।
नतीजा यह कि कई वर्ष लग सकते हैं छोटे-मोटे परिवर्तन लाने में भी। कलेक्टर का पद शुरू किया गया था अंग्रेजों के दौर में और बहुत पहले समाप्त कर देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है, क्योंकि आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने प्रशासनिक सुधार लाने की हिम्मत नहीं दिखाई है। ब्रिटेन में कलेक्टर नहीं होते। वहां विकास और परिवर्तन के तमाम फैसले वे लोग लेते हैं, जिन्हें जनता चुनकर भेजती है।
सो प्रधानमंत्री जी, आपसे विनम्रता से आग्रह करती हूं कि इस बार लाल किले से प्रशासनिक सुधार लाने का वादा करें। वैसे भी हम विकास की दौड़ में कई गरीब देशों से भी पीछे रह गए हैं। जब तक हम घिसे-पिटे प्रशासनिक तरीकों में सुधार लाने का काम नहीं करते, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी।