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युवाओं और छात्रों की मुश्किलें

दीपक जोशी, अमिय कुमार महापात्र Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 08 Jun 2020 08:28 AM IST
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बेरोजगारी - फोटो : social media

कोरोना संकट के बीच प्रवासी मजदूरों से लेकर कोरोना योद्धाओं की पीड़ा किसी से छिपी नहीं है, फिर चाहे वह महाराष्ट्र में रेल की पटरियों पर जान गंवाने वाले मजदूर हों या फिर चेन्नई में कोरोना मरीजों का इलाज करते-करते स्वयं संक्रमित हो चिरनिद्रा में चले जाने वाले डॉक्टर, ये तमाम घटनाएं हृदय विदारक हैं। वाकई में इस त्रासदी की सबसे ज्यादा मार प्रवासी मजदूरों एवं अन्य कामगारों पर पड़ी है, पर छात्रों और खासकर उच्च शिक्षा हासिल कर रहे छात्रों की चर्चा भी प्रासंगिक जरूर है, क्योंकि एक तरफ उनकी परीक्षाओं पर संशय है, दूसरी तरफ नौकरियों के घटते अवसरों से आशंका।



जब इस महामारी के बीच, सीएमआईई के मुताबिक, 20-30 साल के 2.7 करोड़ युवाओं ने अपनी नौकरी गंवा दी, तो अतिरिक्त युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर नौकरी की अपेक्षा करना बेमानी होगा। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे के अनुसार, 2018-19 में देश में 3.74 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा हेतु पंजीकृत थे, और प्रतिवर्ष डिग्री लेकर लगभग 91 लाख छात्र पास-आउट होते हैं। देश में नियोजनीय छात्रों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और व्हीबोक्स के सीआईआई, एआईसीटीई एवं अन्य के साथ मिलकर किए गए इंडिया स्किल सर्वे, 2020 के अनुसार, इस साल कॉलेजों से पास आउट होने वाले छात्रों में तकरीबन 46 फीसदी नौकरी प्रदान किए जाने योग्य हैं, जबकि 2014 में यह आंकड़ा 34 प्रतिशत था।


डिग्री लेने और नौकरी की आस में अंतिम वर्ष के इन छात्रों की मनोदशा इस वक्त क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है, पर इतना जरूर है कि इनके साथ इनके माता-पिता भी पसोपेश में जरूर होंगे। लॉकडाउन में आईआईटी-आईआईएम जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में भी कंपनियों द्वारा प्लेसमेंट ऑफर वापस लिए जाने की खबरें आई थीं, तो फिर आम कॉलेजों के छात्रों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।


हालांकि इस विभीषिका के बीच मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा छात्रों को राहत प्रदान करने हेतु कई कदम उठाए गए हैं, जिनमें ऑनलाइन शिक्षा, अंतिम वर्ष के छात्रों को छोड़ अन्य को आंतरिक अंकों के आधार पर पास करने जैसे कदम हैं।


टाटा, अमेजॉन जैसी कई निजी कंपनियों ने मुफ्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम संचालित कर इस महामारी में छात्रों को अगर सहूलियत दी है, तो असमानता की लंबी लकीर भी खींची है। उस पर से नौकरी की बाट जोह रहे छात्रों या शिक्षा ऋण ले चुके मध्य या निम्न मध्यवर्ग के छात्रों के माता-पिता की दुविधा समझी जा सकती है। इसे देखते हुए सरकार को शिक्षा ऋण के मामले में छात्रों के हित में ठोस कदम उठाने चाहिए । साथ ही, ऑनलाइन शिक्षण या मूल्यांकन के मामले में सरकार को सबके लिए समान अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए।


संकट की इस घड़ी में सिर्फ सरकार की ओर टकटकी लगाने के बजाय व्यक्तिगत स्तर पर भी कदम उठाए जाने चाहिए। अभिभावकों का अपने बच्चों को भावनात्मक सहारा देना जरूरी है, ताकि उन्हें अवसाद न हो। यदि नौकरी, प्लेसमेंट आदि में समय हो, तो छात्रों को भी कोई अन्य अवसर जैसे कोई प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप आदि लेने से नहीं चुकना चाहिए।


कॉलेजों को भी खासकर अंतिम वर्ष के छात्रों को मूल्यांकन के उपरांत हाशिये पर नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उनसे लगातार संपर्क बनाए रख उन्हें स्वरोजगार हेतु प्रेरित करना चाहिए और केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा जारी विभिन्न स्वरोजगार और स्टार्ट अप योजनाओं के बारे में जानकारी देनी चाहिए। इन छात्रों को फसल से लेकर फ्लाइट तक कई नई संभावनाओं हेतु आसानी से प्रेरित किया जा सकता है।
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विपदा की इस घड़ी में हमारे युवाओं को उनकी शक्ति-योग्यता का स्मरण करा सकने वाले जामवंतों की जरूरत है, जो उनके भय और संशय को दूर कर उन्हें प्रेरित कर सके। कौन जाने, आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में इन युवाओं की अहम भूमिका हो और इनके मध्यम से 'आपदा में अवसर' वाली बात चरितार्थ कर भारत दुनिया को फेसबुक, ट्विटर, गूगल या फाइव जी का मजबूत विकल्प प्रदान कर दे।

- लेखकद्वय शिक्षाविद और दिल्ली स्थित उच्च शैक्षिक संस्थानों से संबद्ध हैं।

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