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किसानों को ही क्यों छला जाता है

Thu, 31 Oct 2013 06:21 PM IST
महक सिंह
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भारत जैसे कृषिप्रधान देश में गेहूं उत्पादकों के प्रति सरकार का सुलूक स्तब्ध करने वाला है। उन किसानों का क्या अपराध है, जिन्होंने देश को न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि निर्यातक देश का भी दर्जा दिलाया! पर उन्हें प्रोत्साहन देने के बजाय उत्पादन लागत से भी कम समर्थन मूल्य देकर उनका घनघोर उत्पीड़न तो किया ही जा रहा है, भविष्य की खाद्य सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है।
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वर्ष 1965 तक देश की जनता का पेट भरने के लिए पीएल-480 के तहत अपमानजनक शर्तों पर गेहूं का आयात करना पड़ता था। परंतु हरित क्रांति के प्रारंभ में उन्नत प्रजाति के बीज, खर्चीली कृषि तकनीक के प्रयोग तथा सरकार द्वारा उचित समर्थन मूल्य देने से किसानों ने गेहूं उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बना दिया। लेकिन एक दशक बाद ही कृषि अनुसंधान की अनदेखी और असंतुलित उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग, घटती फसल विविधता, घटते जलस्तर, गैर कृषि कार्यों में बढ़ता कृषि क्षेत्रफल एवं समर्थन मूल्य में अपेक्षाकृत कम वृद्धि के कारण गेहूं उत्पादन में ठहराव ही नहीं आया, बल्कि इन गलत नीतियों ने 2006-2007 में भारत को फिर से गेहूं आयातक देश बना दिया गया। वर्ष 2006-07 में 55 लाख टन और उसके अगले साल 18 लाख टन गेहूं का आयात 1,600 से 2,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किया गया, जबकि देश के किसानों को बोनस समेत केवल 850 रुपये प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य दिया गया! लेकिन जब सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया, तो किसानों ने पिछले तीन वर्षों में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन कर देश को पुनः गेहूं का निर्यातक देश बना दिया।

इसके बावजूद सरकार कोई सबक न लेते हुए फिर से किसानों के उत्पीड़न पर उतर आई है। वर्ष 2014-15 के लिए केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य में पिछले वर्ष की तुलना में मात्र 50 रुपये की वृद्धि करके गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,400 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। उसने कृषि मंत्रालय की सौ रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया। खाद्य मंत्री के पी थॉमस का तर्क है कि समर्थन मूल्य में ज्यादा बढ़ोतरी करने पर महंगाई, खाद्य सब्सिडी बिल और वित्तीय घाटा बढ़ जाता। सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने का उद्देश्य यह होता है कि किसानों को बाजारी शक्तियों के भरोसे न छोड़ा जाए। किसानों को बाजार के भरोसे छोड़ने का मतलब है, उन्हें औने-पौने दामों पर अपना अनाज बेचने के लिए विवश करना।
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समर्थन मूल्य में मात्र पचास रुपये की बढ़ोतरी इस अर्थ में अनुचित है कि यह वृद्धि उत्पादन लागत में वृद्धि के अनुरूप नहीं है। पिछले एक वर्ष में डीजल की कीमत 14 प्रतिशत, मजदूरी की लागत में 20 प्रतिशत, भूमि के किराये में 25 प्रतिशत तथा कटाई व जुताई के खर्च में क्रमशः 20 और 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके कारण गेहूं की उत्पादन लागत बढ़कर करीब 1,615 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। हालांकि कृषि मंत्रालय में उत्पादन लागत निकालने की पद्धति आधारहीन, काल्पनिक एवं त्रुटिपूर्ण होने के कारण उत्पादन लागत का आकलन भी वास्तविक उत्पादन लागत से कम आता है। चर्चित कृषि वैज्ञानिक डॉ स्वामीनाथन के अनुसार, फसलों के उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य निर्धारित करना चाहिए। लेकिन उत्पादन लागत पर यदि मात्र 25 प्रतिशत लाभ भी दिया जाए, तो गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,000 रुपये घोषित करना चाहिए।

हाल के वर्षों में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने के कारण सरकारी खरीद इतनी अधिक हुई कि गेहूं का समुचित भंडारण तक संभव नहीं हो पाया। संसद में खुद सरकार ने स्वीकारा है कि पिछले वर्ष 58,000 करोड़ रुपये का गेहूं उचित रख-रखाव के अभाव में सड़ गया, जो कुल भंडारण का 15 प्रतिशत था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद भी उसे गरीबों में नहीं बांटा गया। सड़ा हुआ गेहूं 6.20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से शराब कंपनियों को बेच दिया जाता है। इस समय देश से एक करोड़ टन गेहूं का निर्यात आसानी से किया जा सकता है। लेकिन सरकार ने मात्र 50 लाख टन निर्यात की अनुमति प्रदान की है। यदि आवश्यकता से अधिक गेहूं का निर्यात कर दिया जाता, तो पहले तो वह सड़ने से बचता, और यदि यह धनराशि सब्सिडी के रूप में किसानों को दे दी जाती, तो लाभकारी मूल्य मिलने से किसान भी संतुष्ट हो जाते।

देश में गेहूं उत्पादक प्रांतों में कृषि योग्य उपजाऊ भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण और उसके दूसरे उपयोग के कारण कृषि भूमि का क्षेत्रफल घट रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी उपज में कमी हो रही है। देश की जनसंख्या में लगातार वृद्धि के कारण खाद्यान्न की मांग भी बढ़ रही है। यदि उत्पादन लागत के आधार पर गेहूं का लाभदायक मूल्य नहीं दिया गया, तो किसान गेहूं की खेती से विमुख हो जाएंगे। वैसी स्थिति में विदेशों से महंगे गेहूं का आयात करने के लिए विवश होना पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि देश में गैर कृषि पदार्थों के मूल्य बराबर बढ़ रहे हैं। किसान एक बड़ा उपभोक्ता भी है। लेकिन वह अपने उत्पाद की कम कीमत पाने और महंगे गैर कृषि पदार्थों की खरीद की दोहरी मार झेल रहा है। छठे वेतन आयोग के कारण कर्मचारियों का वेतन 150 प्रतिशत बढ़ गया है। खाद्य सुरक्षा कानून से देश की 67 प्रतिशत जनता को सस्ता अनाज दिया जाएगा। कॉरपोरेट जगत को भी खुले दिल से छूट दी जा रही है। ऐसे में किसानों को उनके अनाज का लाभकारी मूल्य न देना अन्याय है।
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