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तीसरे मोरचे के गठन की मुश्किलें

Fri, 05 Oct 2012 10:07 PM IST
अरुण नेहरू (वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
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जैसे-जैसे हम 2014 के लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे हैं, राजनीतिक हलचल बढ़ती जा रही है। कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर सोनिया गांधी की मजबूत पकड़ के कारण समस्याएं बेशक कम हैं, लेकिन सुधारात्मक उपाय के तहत पार्टी और सरकार, दोनों में इस महीने के अंत तक बदलाव की उम्मीद है। भाजपा में शीर्ष स्तर पर स्थिति ठीक इसके विपरीत है। वहां न सिर्फ शीर्ष पर विवाद हैं, बल्कि उसे 2014 तक कई राज्यों में सत्ता-विरोधी रुझान का सामना भी करना पड़ सकता है। चूंकि आगामी लोकसभा चुनाव में दोनों राष्ट्रीय दलों में से कोई भी डेढ़ सौ से अधिक सीटें नहीं जीत पाएगा, वैसे में क्षेत्रीय दल और तीसरा मोरचा प्रभावी भूमिका में रहेंगे, जो 240 से 250 सीटें जीत सकते हैं।
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तीसरे मोरचे में 40 से 50 पार्टियां आ सकती हैं, जिसमें पांच से छह वरिष्ठ नेता होंगे। बाद में इसमें शरद पवार, मुलायम सिंह, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, नवीन पटनायक आदि शामिल हो सकते हैं। 30 सीटों वाले वाम दल एवं लगभग 25 सीटों के साथ मायावती की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। इस मोरचे में न सिर्फ धर्मनिरपेक्ष एवं गैर धर्मनिरपेक्ष धड़े होंगे, बल्कि वे समय के साथ यह तय करेंगे कि किस दिशा में जाना है।
क्षेत्रीय दलों में तेलुगू देशम पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, वाईआरएस कांग्रेस, असम गण परिषद्, जद (यू), राजद, लोजपा, इनेलो, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, झारखंड मुक्ति मोरचा, झारखंड विकास मोरचा, जद (एस), बसपा, रालोद, सपा, राकांपा, शिवसेना, मनसे, अकाली दल, बीजद, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लॉक, आरपीआई और पूर्वोत्तर की 10 छोटी पार्टियां हैं। इसके अलावा कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी एक क्षेत्रीय पार्टी बनाने वाले हैं। हर महीने परिदृश्य पर एक नई राजनीतिक पार्टी होगी। अरविंद केजरीवाल की पार्टी इसकी ताजा मिसाल है।
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इन तमाम क्षेत्रीय दलों को धर्मनिरपेक्ष एवं गैर धर्मनिरपेक्ष धड़े में बांटने पर स्पष्ट तसवीर उभरेगी। लेकिन जैसे ही हम छोटे-छोटे गुटों को अलग करेंगे, तो भ्रम की स्थिति दिखाई देगी। जैसे कि शिवसेना दो धड़ों में बंट गई है और राकांपा भी उसी दिशा में बढ़ रही है। इन सभी पार्टियों का नेतृत्व कोई न कोई करिश्माई नेता कर रहा है। ऐसी पार्टियां सामान्यतया तभी टूटती हैं, जब नेता पार्टी को एकजुट रखने में असमर्थ हो जाते हैं। अब द्रमुक का ही उदाहरण लीजिए। इस पार्टी के वयोवृद्ध बीमार सुप्रीमो को अपनी दो पत्नियों, दो बेटों, एक बेटी और दो भतीजों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ा रहा है। इस तसवीर में अब तो उनके नाती-पोते भी शामिल हो रहे हैं। हमने तीन दशकों तक गठबंधन सरकार देखी है। इसमें स्थिरता हमेशा ही एक बड़ा मुद्दा रही है, क्योंकि इसमें कई पहलू और कई नेता होते हैं, बल्कि कई बार जो चीजें केंद्र को अनुकूल लगती हैं, वे राज्यों के अनुकूल नहीं होतीं।

दिल्ली का जंतर-मंतर कई नेताओं की मौजूदगी का गवाह रहा है, और ममता बनर्जी इसका अपवाद नहीं हैं। तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी तीन दिनों तक टेलीविजन चैनलों पर छाई रहीं, उनके इंटरव्यू कई बार दोहराए गए। सोशल नेटवर्क पर भी उनकी धूम रही, लेकिन दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ठंडी प्रतिक्रिया रही। तृणमूल कांग्रेस ने न सिर्फ कांग्रेस के साथ अपना गठबंधन खत्म कर दिया, बल्कि उस पर हमला भी किया। लेकिन दोनों दलों के बीच की इस खींचतान का लाभ वाम दलों और मुलायम सिंह यादव को मिलेगा, संयुक्त रूप से जिनकी सीटों की संख्या 60 तक, और क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बनाने पर 100 तक जा सकती है।

भाजपा के सामने केंद्र में नेतृत्व का मसला है, लेकिन भाजपा के ऊपर सबसे बड़ा दबाव एनडीए को एकजुट रखने का है। बिहार में पहले से ही समस्या है, जहां पार्टी संघर्ष की तरफ बढ़ रही है। वहां नीतीश कुमार के नेतृत्व में जद (यू) काफी ज्यादा सीटें जीत सकती हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी की स्थिति हालांकि मजबूत है, लेकिन भाजपा में ही नेता के रूप में उनकी स्वीकार्यता विवादों से परे नहीं है। अगर पार्टी में इसका समाधान निकल आता है, तो भी सहयोगी दलों के साथ यह मुद्दा बना रहेगा। गठबंधन की मौजूदा जटिलता के मद्देनजर सर्वसम्मत फैसला जरूरी है, क्योंकि एकमत नहीं होने पर कोई भी अपना निर्णय थोपने में सक्षम नहीं होगा।

हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनावों की अधिसूचना जारी हो चुकी है। हिमाचल में नवंबर की शुरुआत में और गुजरात में मध्य दिसंबर में दो चरणों में चुनाव होंगे। हिमाचल प्रदेश में कांटे की टक्कर के आसार हैं। हालांकि असली तसवीर तो टिकट वितरण के बाद ही साफ होगी, लेकिन वहां भाजपा को सत्ता-विरोधी रुझान का सामना करना पड़ेगा। गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा जीतती हुई दिखाई दे रही है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी मौजूदा 119 सीटों से आग बढ़ पाएंगे या कांग्रेस आदिवासी इलाकों में फायदा उठाकर इस संख्या को घटाकर 110 तक कर देगी। कांग्रेस और भाजपा, दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी ओर से बेहतर प्रयास करेगी और यह राजनीति के लिए अच्छी बात है।
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