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फिर भी कठघरे में औरत

Thu, 03 Oct 2013 07:13 PM IST
किरन यादव
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देश में एक तरफ जहां बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर इन घृणित मामलों में गुनाह सिद्ध कर अपराधियों को सजा दिला पाने की दर बेहद कम है। पिछले वर्ष गुनाह साबित कर दंड दिला पाने की दर सिर्फ 24 फीसदी ही थी। इसका मतलब तो यही है कि बलात्कार जैसी दरिंदगी के संगीन आरोप से घिरे 76 फीसदी अभियुक्त बच निकले। हालात यही रहे, तो ऐसे घिनौने अपराधों पर अंकुश लगाने के कानूनी तंत्र के मकसद को तगड़ा झटका लगना तय है। यही वजह है कि अब ऐसे गुनाहों के लिए कठोर दंड के बजाय ज्यादा जोर इस बात पर हो कि आरोपियों को सजा निश्चित तौर पर हो। इसके लिए यह जरूरी है कि अपराध-न्याय तंत्र बलात्कार पीड़िता के लिए अधिकाधिक संवेदनशील हो। पुलिस और न्याय व्यवस्था के हर घटक को मानसिक और शारीरिक यातना झेल रही अबलाओं के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की बेहद जरूरत है।
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शायद ही कोई इस हकीकत से इनकार करेगा कि न्याय का दरवाजा खटखटा रही बलात्कार पीड़िता को कानूनी प्रक्रिया के दौरान यातना के एक और दौर से गुजरना पड़ता है। यह पूरी प्रक्रिया कितनी अपमानजनक और नीचा दिखाने वाली होती है, इसकी असल तस्वीर तो पीड़िता ही बयां कर सकती है। घिनौने अपराध की शिकार पीड़िता किसी तरह साहस जुटाकर जब एफआईआर दर्ज कराने पुलिस स्टेशन में दाखिल होती है, तो वहां उसका स्वागत करने को तैयार मिलता है जिल्लत और यातना भरा एक और माहौल। थाने में तैनात हेड कांस्टेबल मोहर्रिर (एचसीएम), जो अमूमन अधेड़ उम्र का ही होता है, पीड़िता को सिर से पैर तक तरेरता है। या यह कह लें कि उसकी नजरें उसके सिर से पैर तक फिसलती हैं। यही नहीं एफआईआर दर्ज करने के फर्ज को अंजाम देने के मकसद से तैनात किए गए एचसीएम को यह मनवा पाना बेहद मुश्किल होता है कि ऐसा गुनाह हुआ है। उन क्षणों को फिर से जीने की जिल्लत और कहीं नहीं बल्कि पुलिस स्टेशन पर ही उठानी पड़ती है, जहां कानून के रखवाले तैनात होते हैं। फिर मजबूर महिला को इस कड़वी सच्चाई से भी सामना करना पड़े कि एफआईआर ही दर्ज न हो। इसके लिए हेड कांस्टेबल को भी क्या दोष दिया जाए! व्यवस्था ही ऐसी है कि वह इस तरह से बर्ताव करता है। बहरहाल मामला फिर एसएचओ के पाले में पहुंचता है। ज्यादातर पुरुष अधिकारियों की भरमार वाले पुलिस थानों में महिला को हमदर्दी भरी नजरों से नहीं, बल्कि संदेहास्पद निगाहों से देखा जाता है।

साक्ष्य जुटाने में पुलिस की मदद करने के नाम पर महिला का एक बार फिर शोषण होता है, जिससे उसकी परीक्षा और कठिन हो जाती है। इस क्रम में मेडिकल परीक्षण का सिलसिला बेहद अपमानजनक होता है। और कई बार आदतन ऐसे कृत्य करने वाली करार दे दिया जाना, तो उस महिला के लिए खुदकुशी का रास्ता खोलने वाला कदम हो सकता है। लंबे समय से चला आ रहा यह टेस्ट क्या गैर जरूरी और गैरतार्किक नहीं है? क्या पुरुष डाक्टर द्वारा फिंगर टेस्ट किया जाना महिला के साथ एक और बलात्कार नहीं है?
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महिला की यातना का दौर कोर्ट में भी आकार थमता नहीं है। अपराध न्याय व्यवस्था का यह तर्क अपनी जगह ठीक है कि किसी निर्दोष को दंडित न किया जाए। ऐसे में मानवीय और संवेदनशील तंत्र को वजूद में लाकर महिला की अस्मिता को फिर से तार-तार होने से बचाने का जिम्मा भी तो इसी अपराध-न्याय व्यवस्था पर है। क्या कुछ सुधार लाकर महिला का दर्द कम नहीं किया जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि कुछ सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। रिपोर्ट दर्ज करने का जिम्मा किसी महिला अधिकारी को दिया जाना चाहिए। यही नहीं, जांच का जिम्मा भी महिला पुलिस अधिकारी का हो। दहेज हत्या मामलों में दंडित किए जाने की दर 32 फीसदी है। ऐसे में बलात्कार मामलों में भी यह दर बढ़ाने के लिए जरूरी है कि इसमें भारतीय साक्ष्य अधिनियम के 113 बी के प्रावधान रेप के मामलों में भी हों, ताकि अपनी बेगुनाही आरोपी को उसी तरह साबित करना पड़े जैसे दहेज के मामलों में किया जाता है। कार्यपालिका, न्यायपालिका से लेकर पुलिस तंत्र सभी इस पर विचार कर ठोस कदम उठाएं, तो बेहतर होगा।
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(लेखिका उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सदस्य हैं)
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