कुछ घटनाएं कभी-भी घट सकती हैं। कई बार तो आश्चर्य होता है कि वे अभी तक घटी क्यों नहीं? माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी अभी क्यों मारा गया, वह तो कभी-भी मारा जा सकता था। उत्तर प्रदेश की जेलों के जो हालात हैं, उनमें तो कोई-भी कभी-भी मारा जा सकता है। क्षमता से कहीं ज्यादा लोगों को अपने अंदर ठूंसे हुए, अव्यवस्था और गंदगी से बजबजाती तथा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जेलों में तो मुन्ना बजरंगी जैसे लोग ही शासन करते हैं। वे तभी मारे जा सकते हैं, जब उनसे भी शातिर दिमाग और अधिक संसाधनों वाला डॉन पीछे पड़ा हो।
जिस तरह मुन्ना बजरंगी की हत्या हुई, उससे तो यही लगता है कि कोई ऐसा ही व्यक्ति इस घटना का सूत्रधार था। षड्यंत्र कितना गहरा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसे झांसी जेल से अदालत में सुनवाई के लिए बागपत जेल लाया गया, जहां पहले से ही एक भाड़े का हत्यारा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था और उसे हत्या के लिए एक अत्याधुनिक हथियार सारी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए उपलब्ध कराया गया था।
अमूमन बड़े अपराधी जेलों में अपने आराम और सुरक्षा का इंतजाम वहां उपलब्ध बंदियों में से ही कर लेते हैं, पर मुन्ना बजरंगी को सुविधाएं हासिल करने का यह मौका नहीं मिला, क्योंकि बागपत जेल में वह जिस दिन पहुंचा, उसकी अगली सुबह ही उसका काम तमाम कर दिया गया। अदालत की जिस पेशी पर उसे लाया गया था, वह उसे झांसी जेल से वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिये भी भुगत सकता था। उसकी पत्नी खुलेआम आशंका जाहिर कर रही थी कि उसे जेल में मारा जा सकता है, इसके बाद भी उसे बागपत लाया गया – मतलब एकदम साफ है कि उसकी हत्या के पीछे बड़ा शातिर और समर्थ दिमाग था।
यह एक आम जानकारी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज्यादातर बड़े अपराध, खास तौर से अपहरण, फिरौती या गुंडा टैक्स से संबंधित, जेलों से संचालित होते हैं। पुलिस के होशियार थानेदार जेल में अपने सूत्र रखते हैं। वहीं से उन्हें सटीक मुखबिरी मिलती है। कई बार तो किसी सनसनीखेज अपराध की गुत्थी सुलझाने के लिए वे अपना मुखबिर छोटी-मोटी धाराओं में जेल में दाखिल करा जरूरी सूचनाएं निकलवा लेते हैं। मोबाइल फोनों ने इस तंत्र का काम आसान कर दिया है। कभी-कभार बाहरी एजेंसियों द्वारा छापे मार कर जेल की बैरकों से बरामद मोबाइल या सिम कार्ड तो टिप ऑफ द आइसबर्ग हैं। जितने जब्त होते हैं, उससे ज्यादा आ जाते हैं।
जेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार के अलावा जेल कर्मियों का असुरक्षित जीवन भी वहां मौजूद बड़े अपराधियों के दबदबे का कारण है। हर साल हम कुछ जेल अधिकारियों की हत्या या उनपर हमलों की खबरें पढ़ते रहते हैं। असुरक्षित जेल क्वार्टरों में रहते हुए, अल्प प्रशिक्षित और बाबा आदम के जमाने के हथियारों से सुसज्जित इन जेल कर्मियों को आप हमेशा अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चिंतित देख सकते हैं।
जेल के अंदर प्रशासन चलाने का ये जेलकर्मी एक ही आदिम तरीका जानते हैं – क्रूरता पूर्ण शारीरिक प्रताड़ना देकर बंदी का मनोबल तोड़ उसे अपने मनमाफिक अनुशासन के घेरे में ले आए। पुराने और जघन्य अपराधों में बंद कैदियों के भरोसे वे अपना आतंक कायम रखते रहते हैं। अंग्रेज बहादुर के शासन में और आजादी के बाद भी वर्षों तक यह नुस्खा कारगर रहा, लेकिन आज अपराधी का प्रोफाइल इतना बदल गया है कि अब इससे काम चल नहीं रहा।
आज हर बड़े अपराधी का कोई राजनीतिक आका है और वह इसे छिपाने का प्रयत्न भी नहीं करता। उत्तर प्रदेश में तो अक्सर मंत्री जेलों में अपने समर्थक गुंडे से मिलने जाते रहे हैं और इसमें कोई भी राजनीतिक दल अपवाद नहीं है। बिना जेल तक गए भी जेलर को एक फोन ही बंदी को सारी सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है। इसके अलावा उनके पास बात न मानने वाले जेलकर्मियों के परिवार को शारीरिक क्षति पहुंचाने का विकल्प तो है ही। ऐसे में जेल कर्मियों के सामने सबसे बढ़िया विकल्प पैसा लेकर बारसूख बंदियों को हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराना है।
हाल में मुझे एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करने वाले मित्र ने जेलों के दिलचस्प अर्थशास्त्र से परिचित कराया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक जेल में उनके एक व्यापारी मित्र बंद हुए, तो वहां मिलने जाने पर उन्हें पता चला कि उनके मित्र सवा लाख रुपये जेल अधिकारियों को हर महीने घर के खाने, दवाइयों की निर्बाध आपूर्ति, वार्ड में कूलर, पान मसाले और दो सेवादार कैदियों जैसी सुविधाओं के लिए देते हैं। मित्र चूंकि कॉरपोरेट दुनिया के थे, इसलिए उन्होंने फौरन उस जेल में बंद सक्षम बंदियों की संख्या और उनसे इकट्ठा हो सकने वाले धन का अनुमान लगाना शुरू कर दिया। उनके अनुसार, उस अकेली जेल की मासिक आय एक करोड़ रुपये से ज्यादा होगी। उनका अनुमान कुछ अतिरंजित जरूर हो सकता है, पर सच्चाई से बहुत दूर नहीं।
जेल के ज्यादातर बंदी शुल्क नहीं दे सकते, इसलिए उनकी जिंदगी नर्क से भी बदतर होती है। जेल की क्षमता से कई गुना अधिक, शौचालय और स्नानघर जैसी बुनियादी मानवीय सुविधाओं से वंचित तथा पशुओं के लिए भी अखाद्य जैसा भोजन करने को मजबूर ये गरीब बंदी समाजशास्त्र की उन आधुनिक अवधारणाओं का मखौल उड़ाते से लगते है, जिनके अनुसार, जेलों को प्रताड़ना के नहीं वरन सुधार के ठिकाने होना चाहिए।
सच तो यह है कि कोई सामान्य मनुष्य उत्तर प्रदेश की जेल में कुछ समय गुजार ले, तो इस बात की ज्यादा आशंका है कि वह एक सख्त जान और पेशेवर अपराधी बनकर ही बाहर निकलेगा। ऐसे में जरूरी है कि मुन्ना बजरंगी की हत्या को सिर्फ सनसनीखेज सुर्खियों का विषय न बनाकर इसे जेलों में सुधार के लिए एक जरूरी समाजशास्त्रीय विमर्श का कारण बनाया जाए।