हे प्याज, तेरे दर्शन को मैं अमध्यवर्गीय बाजार की हर दुकान के आगे हाथ में पुराना रेट लिए, कांधे पर पिता के जमाने का फटा झोला लटकाए वैसे ही लाइन में खड़ा-खड़ा हफ्ते से धक्के खा रहा हूं, जैसे कोई गरीब मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिए महीनों से लाइन में लगकर उनसे अमीरी मांगने के लिए हाथ में पांच रुपये लिए सारी उम्र खड़ा रहता है!
आह रे प्याज, एक वह भी समय था, जब तू घर-घर की रसोई में वैसे ही समाया रहता था, जैसे कण-कण में भगवान। मेरे घर में आटा होता था या नहीं, पर रसोई के कोने में तू जरूर पड़ा होता था मेरी तरह! पर आज तो तेरे दर्शन भी दुर्लभ हो गए। आजकल तो जब-जब मौका मिलता है, तुझे बीती जवानी के दिनों की प्रेमिका की तरह आंखों से आंसू बहाते हुए, आंखें बंदकर तेरे पुराने रूप के दर्शन कर तेरी खुशबू से मन भर लेता हूं। हाय रे मेरी त्रासदी!
हे प्याज, तू तो बिना बताए ही मार्केट से ऐसे गायब हो गया, जैसे कोलगेट की फाइलें गायब हो गईं। पर फाइलों का पीएमओ ऑफिस के लिए कोई महत्व हो या न हो, पर हमारे जीवन में तेरा महत्व इतना है कि हम तेरे बिना एक पल भी नहीं जी सकते। हम दाल के बिना जी सकते हैं, पर तेरे बिना नहीं। हम जल के बिना जी सकते हैं, पर तेरे बिना नहीं। हम सरकार के बिना जी सकते हैं, पर तेरे बिना नहीं। हम एक दूसरे के बिना जी सकते हैं, पर तेरे बिना नहीं।
अच्छा चल, तुझे हम पर रहम नहीं तो कम से कम दिल्ली सरकार पर तो रहम कर। हमारा क्या है? हमें तो कोई भी रूला देता है। हम तो सावन में भी रोने वाली क्लास के बंदे हैं। पर यार, सरकार का तो कम से कम ध्यान रख। देख तो वह तुझसे कितनी डरी हुई है? वह किसी के आगे बेचारी हो या न हो, पर तेरे आगे कितनी बेचारी हो गई है? हर जगह तेरे दर्शन करवाने को स्पेशल गाड़ियां चला रही है। किलो के बदले पौना किलो थमा जनता का मन बहला रही है। उसे पता है कि जनता रुठे तो गम नहीं, पर जो तू एक बार बिगड़ गया, तो इतिहास गवाह है कि सरकार का सारा गणित बिगाड़ कर रख देता है।
हे प्याज, तुझे सरकार की फिक्र, न सही। मेरी परवाह, न सही, पर मेरी पत्नी के आंसू देखकर तो पसीज जा रे हरजाई। देख तो वह मेरे बिना कतई उदास नहीं। पर तेरे बिना कितनी उदास है। तुझे क्या मेरी पत्नी पर भी दया नहीं आती रे निष्ठुर?