गधा भागा जा रहा था...बगटूट! गधे को इस तरह भागते देख मुझे घोड़े का वहम हो आया। पर वह पक्के में गधा था, क्योंकि वह ढेंचू-ढेंचू कर रहा था। मुझे लगा कि यह ऐसे भागता रहा, तो कहीं घोड़ा न हो जाए। गधे की तो पहचान ही उसका मस्ती में चलना है, फिर कुम्हार या धोबी कितना ही डंडा क्यों न तोड़ ले।
क्या बात है...परंपराओं के खिलाफ कहां भागे जा रहे हो? मैंने उसका गधापन याद दिलाने की गरज से रोका। पेट्रोल के दाम फिर बढ़ गए हैं...। कहते हुए वह फिर दौड़ लगाने की मुद्रा में आ गया।
तो तुम्हें क्या...यह चिंता तो घोड़े को करनी चाहिए, क्योंकि पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियां हॉर्स पावर से चलती हैं। तुम्हारा और पेट्रोल का क्या रिश्ता..! मैंने समझदारी की बातें की।
पेट्रोल इसी तरह महंगा होता रहा, तो हमारी कमर टूट जाएगी। गधे ने संपूर्ण गधेपन को समेटते हुए कहा, तो मुझे हंसी आ गई।
आम आदमी को हर बार लगता है कि पेट्रोल के दाम पांच रुपये और बढ़े, तो उसकी कमर टूट जाएगी। मगर हर बार पेट का दर्द इतना ज्यादा हो जाता है कि कमर का टूटना मुल्तवी हो जाता है। जनता को तो यह भी पता नहीं कि उसकी कमर साबुत है या टूट गई है। गधेपन से आम आदमी को बाहर निकालते हुए मैंने कहा।
आम आदमी तो हर बार कहता है कि हाय, कमर टूट गई महंगाई से...मगर हम तो भुक्तभोगी हैं। जब भी पेट्रोल महंगा होता है, हमारी कमर टूट जाती है। यह कहते हुए गधे के चेहरे पर टीस थी, जो कमर से खिंचकर यहां तक आ गई थी।
तुम्हें तो चलने-फिरने के लिए पेट्रोल नहीं खरीदना पड़ता। फिर तुम्हारी कमर कैसे टूट जाती है?
जब भी पेट्रोल के भाव बढ़ते हैं, तो राजनीतिक दलों को हमारी ही याद आती है। जुलूस निकालेंगे, रैली करेंगे या सड़क पर बैठ जाएंगे, मगर उन्हें चढ़ने के लिए एक अदद गधे की तलाश रहती है। वे हमारे गले में तख्तियां लटका देते हैं और दो-दो, चार-चार हमारी पीठ पर लद लेते हैं। उनका मकसद यह बताना होता है कि पेट्रोल महंगा है, तो गधे से काम चलाना पड़ेगा। वे तो अपना काम निकाल कर गाड़ी से फुर्र हो जाते हैं और हमें स्थायी रूप से कमर दर्द दे जाते हैं। महंगाई से आम जनता की कमर टूटती है या नहीं, मालूम नहीं, मगर हमारी कमर तो टूटती ही है...। कहते हुए गधे के मुंह से फिर ढेंचू-ढेंचू निकलने लगा, जिसका भावार्थ यही था कि कमर तोड़ दी इस महंगाई ने!