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उदार होने की जरूरत: कट्टरवाद और धर्म के नाम पर निरंतर फैलते आतंकवाद को रोकना बड़ी चुनौती

तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 16 Nov 2020 02:45 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

कुछ विराम के बाद पेरिस, निस, विएना, काबुल-कई जगह लगातार आतंकवादी हमले हुए। जब-जब इस्लाम के नाम पर हमले होंगे और निरपराध लोग मारे जाएंगे, तब-तब दक्षिणपंथी कट्टर राजनीति मजबूत होगी। इस्लाम के नाम पर आतंकवाद जितना बढ़ेगा, इस्लाम के विरोधी उतने ही मजबूत होंगे। इस्लाम की आक्रामकता और विध्वंसात्मकता के कारण पिछले कुछ दशक में दुनिया भर में इस्लाम की जितनी आलोचना हुई है और हो रही है, उतनी पिछले करीब पांच सौ साल में नहीं हुई।



यूरोप और अमेरिका ने लंबे समय से पश्चिम एशिया में अन्याय और खून-खराबा किया है। पश्चिम एशिया के देशों में साम्राज्यवादी सरकारों की स्थापना, कठपुतली सरकारों का गठन, निरंतर शोषण, क्रांतिकारियों को खत्म करना, धर्मनिरपेक्ष राजनीति का विनाश-यह पश्चिम का सुनियोजित पैटर्न रहा है। सिर्फ अतीत में नहीं, हाल-हाल तक भी यूरोप और अमेरिका ने अपने स्वार्थ के कारण विकासशील और अविकसित देशों में लाखों लोगों की हत्या करवाई है। लेकिन यूरोप-अमेरिका ने गलत नीति अपनाई, तो क्या दूसरों को भी गलत तरीका अपनाना चाहिए? नाजी जर्मनी पर साठ लाख यहुदियों की हत्या का कलंक है। इसके जवाब में यहुदियों ने जर्मनों को मारने का रास्ता अख्तियार नहीं किया। इसके बजाय जीवन के विविध क्षेत्रों में उन्होंने खुद को साबित किया।



इसी का नतीजा है कि जर्मन आज यहुदियों को सलाम करते हैं। इससे शानदार बदला और क्या हो सकता है! मध्यकाल में और आज भी कई जगह लोग आंख के बदले आंख की बात करते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था कि सभी अगर आंख के बदले आंख लेने पर अमल करने लगें, तब तो पूरी दुनिया ही अंधी हो जाएगी। इस्लाम को इससे सीख लेनी चाहिए। आंख के बदले आंख लेने के बजाय दृष्टिबाधित व्यक्ति को रोशनी दिखाने से दुनिया बदलेगी। इस्लाम को शिक्षित और सजग होकर कहना पड़ेगा कि आतंकवाद उसका रास्ता नहीं है। इसके बगैर न तो इस्लाम का भविष्य सुरक्षित होगा, न ही दुनिया का। मुसलमानों को समझना होगा कि उन्हें विविधता भरे इस विश्व में ही रहना है।


मेरा धर्म और मेरा ईश्वर श्रेष्ठ है-इस तरह की गर्वोक्ति का 21 वीं सदी में कोई औचित्य नहीं है। लोकतंत्र आधुनिक विश्व का सबसे जरूरी तंत्र है, क्योंकि यह हर व्यक्ति को बराबर मानता है और उसे मर्यादा देता है। लोकतंत्र और उसके मानक को अस्वीकार करने वाले अकेले पड़ जाएंगे। वाम राजनीति का मुखौटा भी पहले ही उतर गया है। दरअसल वाम राजनीति किसी न किसी रूप में आतंकवाद का समर्थन करती है। वामपंथी राजनीति दक्षिणपंथ की विरोधी है, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि यह धर्म के नाम पर आक्रामकता दिखाने वाले मुस्लिम दक्षिणपंथियों का समर्थन करती है। वास्तव में मुसलमानों में दक्षिणपंथ का ही बोलबाला है। दक्षिणपंथियों के वर्चस्व के कारण ही इस्लाम में धार्मिक कट्टरवाद और स्त्रियों के मामले में पिछड़ा रवैया है। श्रेणीगत विषमताएं भी इसमें मौजूद हैं और नृत्य, संगीत जैसे कला रूपों के प्रति धिक्कार का भाव है। लेकिन इसे व्यापकता में समझने के बजाय दशकों से मुस्लिम कट्टरवाद को समर्थन देकर वामपंथी बड़ी गलती तो कर ही रहे हैं, निकट भविष्य में इस गलती से वे छुटकारा पाएंगे, इसका भी कोई संकेत नहीं मिलता।


इसी कारण वामपंथ का पतन हो रहा है और दुनिया भर में वे सत्ता राजनीति से दूर हाशिये पर पहुंच रहे हैं। इस्लाम से लोग आतंकित क्यों हैं? इसलिए कि इस्लाम के नाम पर आतंकवादी दुनिया भर में हत्याकांडों को अंजाम दे रहे हैं। पिछले दिनों अफगानिस्तान में बाईस छात्र आतंकवाद के शिकार बन गए। उसके पहले भी आतंकवादी हमले में बीस से ज्यादा लोग मारे गए थे। आतंकवाद के निशाने पर मुख्यतया तो गैर-मुस्लिम हैं, लेकिन जो मुसलमान जेहाद के पक्ष में खड़े नहीं होते या इसका विरोध करते हैं, वे भी आतंकवादियों के निशाने पर आ जाते हैं। दुनिया भर में जेहादी हमले में बड़ी संख्या में मुसलमान भी मारे गए हैं। यानी जेहादियों के निशाने पर मुस्लिम, गैर-मुस्लिम, नास्तिक-सब हैं। साफ है कि जेहाद पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है, क्योंकि मुस्लिम देश भी लगातार इसके निशाने पर हैं।


अफगानिस्तान में लगातार आतंकी हमले हो ही रहे हैं। लेकिन फ्रांस और ऑस्ट्रिया में आतंकवादी हमलों के बाद तुर्की, पाकिस्तान और मलयेशिया जैसे इस्लामी देशों ने आतंकवाद के बजाय जिस तरह यूरोप को ही निशाने पर लेना शुरू किया, वह बेहद दुर्भाग्यजनक है। बर्बरता के विरुद्ध खड़े होने के बजाय एक तरह से उन्होंने बर्बरता का ही समर्थन किया। इससे तो जेहादी और प्रोत्साहित ही होंगे। कट्टरवाद का समर्थन करने के कारण ही आतंकवाद पैदा होता है। लेकिन मुस्लिम विश्व इस खौफनाक सच्चाई की अनदेखी कर रहा है। वह इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहा है कि जेहादियों के निशाने पर सिर्फ यूरोप नहीं, बल्कि मुस्लिम देश भी हैं।


इसलिए धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा और हत्या का हर हाल में विरोध होना चाहिए। कट्टरवादियों का वोट पाने के लिए, सत्ता में लंबे समय तक टिके रहने के लिए ज्ञान और विज्ञान पर चर्चा न कर सिर्फ धर्म पर चर्चा करने से कितना भीषण नुकसान होता है, यह मुस्लिम देशों को देखकर स्पष्ट हो जाता है। बल्कि जेहाद के बने रहने का सबसे ज्यादा नुकसान अविकसित मुस्लिम देशों में होता है, विकसित यूरोप में नहीं। बांग्लादेश में जेहादियों के समर्थन में लाखों की भीड़ मौजूद होती है।
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बांग्लादेश की शुरुआती पहचान एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में थी। लेकिन आज उसने अपनी बेहद कट्टर धार्मिक पहचान बना ली है। पर विडंबना यह है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे मुल्कों में अपनी कट्टर धार्मिक पहचान से मुक्ति पाने की कोई आतुरता नहीं है। बल्कि उन देशों में कभी कट्टरवाद के खिलाफ आवाज उठती है, तो वह आवाज बंद कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में कट्टरवाद और धर्म के नाम पर निरंतर फैलते आतंकवाद को रोकना सचमुच बड़ी चुनौती है।

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