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राष्ट्रपति के तौर पर प्रणब दा

Mon, 26 Jun 2017 06:46 PM IST
नीरजा चौधरी
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नीरजा चौधरी
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आगामी जुलाई में राष्ट्रपति भवन से विदा लेने वाले प्रणब मुखर्जी को संविधान विशेषज्ञ और उसमें आस्था रखने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है और पिछले पांच वर्षों में देश के राष्ट्रपति होने के नाते उन्होंने उसका संरक्षण किया है। भारत के संविधान और कांग्रेस पार्टी के संविधान से उनका परिचय अद्भुत है। प्रणब दा वैसे व्यक्ति हैं, जिनसे संविधान के किसी भी प्रावधान या अस्पष्ट क्षेत्रों के बारे में स्पष्ट जानकारी के लिए संपर्क किया जा सकता है।
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जबसे भारत गणतंत्र बना, तबसे विभिन्न राष्ट्रपतियों ने खुद को विभिन्न तरीकों से वर्णित किया। चार प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने वाले आर वेंकटरमण ने खुद को ‘कॉपीबुक’ राष्ट्रपति बताया, जबकि देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायण ने खुद को ‘कार्यशील राष्ट्रपति’ कहा। मिसाइलमैन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ कहा गया, तो कभी-कभी उन्हें बच्चों का राष्ट्रपति भी, जो न केवल बच्चों एवं युवाओं से प्यार करते थे, बल्कि उन्होंने उनके लिए राष्ट्रपति भवन के द्वार खोल दिए। देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने खुद को सामान्य समय में दोस्त एवं दार्शनिक तथा संकट के समय में मार्गदर्शक और संरक्षक बताया।

फखरुद्दीन अली अहमद को ‘रबर स्टांप’ राष्ट्रपति कहा गया, जिन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल संबंधी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया और उनसे यह सवाल भी नहीं पूछा कि उन्होंने कैबिनेट के फैसले के बगैर यह निर्णय क्यों लिया। दूसरी तरफ ज्ञानी जैल सिंह ‘सक्रिय राष्ट्रपति’ माने गए, जिन्होंने राजीव गांधी की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने का मन बना लिया था, जिनके साथ उनके मतभेद थे। 
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अगर कोई प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल का विश्लेषण करे, तो उन्हें तकनीकी रूप से सही और सजग सांविधानिक राष्ट्रपति कहेगा। तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद उन्होंने अपने पहले बयान में स्पष्ट किया कि 'अब मुझे राष्ट्रपति के रूप में संविधान की सुरक्षा और संरक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।' 

हालांकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सबसे दिलचस्प रिश्ते देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच थे। अलग-अलग दृष्टिकोणों के चलते दोनों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद रहते थे, जैसे कि डॉ. प्रसाद रूढ़िवादी और भारतीय परंपराओं में विश्वास रखते थे, तो नेहरू ज्यादा आधुनिक, उदारवादी और पश्चिम के विचारों से प्रभावित थे। पर दोनों ने परिष्कृत ढंग से मतभेदों को अलग रखा और एक-दूसरे के पदों का सम्मान किया। 

राष्ट्रपति के रूप में प्रणब दा का कार्यकाल कम उल्लेखनीय, गैर-विवादास्पद और गैर टकराववादी रहा है। फिर भी कई अंदरूनी सूत्र आपको बताएंगे कि उन्होंने कई अवसरों पर प्रधानमंत्री या उनके मंत्रियों से सवाल पूछे हैं, चेताया है या सरकार के नजरिये से अलग अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन उसे उन्होंने कभी सार्वजनिक नहीं किया। आने वाले समय में वक्त या स्वयं मुखर्जी पर्दे के पीछे के इन घटनाक्रमों पर प्रकाश डालेंगे कि उनके और प्रधानमंत्री मोदी के बीच क्या चल रहा था।

संसद को दरकिनार कर बार-बार अध्यादेश जारी करने के प्रति उनका सख्त रवैया कोई रहस्य नहीं है। कई मौकों पर उन्होंने संसद की अनदेखी करने के लिए अध्यादेश का सहारा लिए जाने को लेकर सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। वह मानते हैं कि अध्यादेश का सहारा विशेष परिस्थितियों में ही लिया जाना चाहिए। शत्रु संपत्ति प्रवर्तन और मान्यकरण अध्यादेश,2016 उनके समक्ष पांच बार लाया गया।  उसके महत्व को देखकर उन्होंने हर बार उसे पारित किया, लेकिन अंत में सरकार को लिखा कि भले ही इसे मंजूरी दी जा रही है, लेकिन उम्मीद है कि ऐसा फिर नहीं होगा और इसे उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए।

पिछले डेढ़ वर्षों में प्रणब मुखर्जी ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ कई बार खुलकर बोला है, जिसमें सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा प्रोत्साहित गोरक्षा एवं गोमांस राजनीति का स्पष्ट संदर्भ था। भारत के बहुलतावादी सिद्धांतों का मजबूत समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि 'असहिष्णु लोगों के लिए भारत में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।' उन्होंने रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद जेएनयू, रामजस कॉलेज और हैदराबाद में हुई घटनाओं के मद्देनजर यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता से काम करने की अनुमति मिलनी चाहिए और विश्वविद्यालयों को बहस का केंद्र बनना चाहिए, न कि हिंसा का। कई मौकों पर उन्होंने संसद में गतिरोध पर भी चिंता व्यक्त की। अपने कार्यकाल में कई बार इस तरह के बयान देकर उन्होंने संसदीय संस्थाओं और बहुलतावादी मूल्यों की रक्षा की, जो भारतीय लोकतंत्र की पहचान हैं और ऐसा करके उन्होंने मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाया और सत्तारूढ़ व्यवस्था को एक संदेश दिया, लेकिन उन्होंने सरकार से कभी टकराव मोल नहीं लिया।

कई लोग उनसे उम्मीद कर रहे थे कि वह अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करने को लेकर केंद्र से सवाल पूछेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जबकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि ‘राष्ट्रपति भी गलती कर सकते हैं।’ अंततः प्रणब मुखर्जी पूरी तरह से कैबिनेट की सलाह पर ही चले। इस संदर्भ में उनका कार्यकाल कम उल्लेखनीय है।

राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल के बजाय उनका राजनीतिक करियर ही उल्लेखनीय रहा। इतिहास उन्हें कांग्रेस के एक कद्दावर नेता के रूप में ही याद रखेगा, जिन्होंने कुशलतापूर्वक अपना दायित्व निभाया और जिन पदों पर रहे, उसकी गुणवत्ता सुधारी।
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