अनेक युवा अपनी प्रतिभा, व्यवसाय और रचनात्मकता को इन्हीं मंचों के जरिये पहचान दिला रहे हैं। दरअसल, समस्या स्वयं सोशल मीडिया नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित उपयोग है। बच्चों का मस्तिष्क विकास की शुरुआती अवस्था में होता है। एल्गोरिदम आधारित प्लेटफॉर्म उनकी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों को पहचानकर उन्हें अधिक से अधिक समय स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। दुनियाभर के शोध लगातार संकेत दे रहे हैं कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग का संबंध अवसाद, चिंता, अनिद्रा, साइबर बुलिंग, आत्मसम्मान में कमी, हिंसक व्यवहार और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं से हो सकता है।
ऐसे में, यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस प्रकार शराब, तंबाकू या वाहन चलाने के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित है, क्या सोशल मीडिया के लिए भी आयु सीमा नहीं होनी चाहिए? इस सवाल का फ्रांस ने जो जवाब ढूंढा है, उसमें अभिभावकों पर निर्भर रहने के बजाय प्लेटफॉर्म संचालकों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित आयु से कम उम्र के बच्चे उनके मंचों तक न पहुंच सकें। भारत, जो दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपभोक्ताओं में शामिल है, के लिए भी यह विषय प्रासंगिक है।
कोविड-19 के बाद तो डिजिटल सेवाओं और ऑनलाइन शिक्षा ने इंटरनेट को जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना दिया है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराध, ऑनलाइन शोषण, फर्जी खबरों, डिजिटल लत और बच्चों के निजी डाटा की सुरक्षा से जुड़ी तमाम समस्याएं भी बढ़ी हैं।
भारत ने डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण कानून और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के जरिये कुछ अहम कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए एक व्यापक नीति की जरूरत अब भी महसूस होती है। सामाजिक, आर्थिक और डिजिटल परिस्थितियों में फर्क की वजह से फ्रांस के मॉडल को हम भले ज्यों का त्यों न अपनाएं, पर इसके कुछ पहलुओं पर अवश्य ध्यान दिया जा सकता है।
जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया को मानव सभ्यता की अगली छलांग के रूप में देखा जा रहा है, तब फ्रांस की संसद का निर्णय यह याद दिलाता है कि किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक पैमाना सिर्फ तकनीक का विस्तार नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी को उसके दुष्प्रभावों से सुरक्षित रखने की क्षमता का होना भी है।