अर्थशास्त्री इन दिनों कोरोना अवधि के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नुकसान की गणना में व्यस्त हैं। भारत के केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) ने जुलाई से सितंबर के बीच जीडीपी में 15.7 प्रतिशत (वार्षिक आधार पर) के संकुचन की गणना की। उससे पहले सीएसओ ने इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी के संकुचन का अनुमान 23.9 प्रतिशत लगाया था। केंद्र सरकार के पिछले मुख्य सांख्यिकीविद प्रणब सेन ने कहा है कि देश की जीडीपी में लगभग 10 प्रतिशत का संकुचन हो सकता है, और उनके अनुसार वृहद आर्थिक स्थिति बहुत अनिश्चित है। रिजर्व बैंक ने हालांकि इस साल सकल घरेलू उत्पाद के इस संकुचन के 7.5 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया है।
जीडीपी में इस संकुचन का कारण समझने के लिए रॉकेट विज्ञान की आवश्यकता नहीं है। किसी देश की जीडीपी उस देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है, जो कि आम तौर पर एक वर्ष के लिए मापी जाती है। चूंकि आर्थिक गतिविधियां, खासकर विनिर्माण और सेवाएं इस वर्ष बुरी तरह प्रभावित हुईं और महामारी के कारण लोगों की आवाजाही कम हो गई, ऐसे में, जीडीपी में गिरावट स्वाभाविक थी। एकमात्र जो क्षेत्र महामारी से प्रभावित नहीं हुआ, वह कृषि था। पिछली दो तिमाहियों में कृषि में 3.4 प्रतिशत (दोनों तिमाहियों) की सकारात्मक वृद्धि हुई है, जबकि विनिर्माण में 39.3 प्रतिशत और 0.6 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। व्यापार, होटल, परिवहन और संचार में क्रमशः 47 और 15.6 प्रतिशत का संकुचन आया।
तीसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियां शुरू हो गई हैं। मांग बढ़ने लगी है और कई अड़चनें भी दूर हो रही हैं। उपभोक्ता मांग का एक संकेतक यात्री वाहन की बिक्री है। नवंबर, 2019 की तुलना में नवंबर, 2020 में यात्री वाहनों में 4.7 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा रही है। नवंबर, 2019 की तुलना में नवंबर, 2020 में ऋण की मांग 5.5 प्रतिशत बढ़ी है। खरीद प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) पिछले चार महीनों से सेवाओं और विनिर्माण क्षेत्रों, दोनों के लिए 50 से ऊपर है और अक्तूबर में पीएमआई 58.9 पर दर्ज किया गया था, जो 13 वर्षों में सबसे तेज वृद्धि है। हालांकि नवंबर में यह घटकर 56.3 रह गया। पर यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग चार महीनों के गंभीर आर्थिक संकट के बाद फिर से चमक वापस आ रही है।
लॉकडाउन के दौरान स्वास्थ्य समस्या (महामारी) और आर्थिक गतिविधियों में गिरावट के कारण रोजगार का नुकसान हुआ। सरकारी वित्त भी बहुत खराब हालत में था। आर्थिक गतिविधियों के बंद होने के कारण राजस्व में गिरावट आ रही थी, फिर सरकार पर समाज के गरीब वर्गों के कल्याण पर अधिक खर्च करने का भारी दबाव भी था। पिछले महीने तक सरकार करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन प्रदान कर रही थी। दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सरकार विभिन्न क्षेत्रों के लिए विस्तृत बूस्टर पैकेज लेकर आई है। उनमें सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) और इलेक्ट्रॉनिक व दूरसंचार क्षेत्रों के उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं शामिल हैं। लाभकारी रोजगार को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप, दोनों तरह की योजनाओं की घोषणा की है। उसने रियल एस्टेट सेक्टर को प्रोत्साहन और विभिन्न वस्तुओं में आयात प्रतिस्थापन की योजनाएं भी पेश की हैं। सभी ने सरकारी वित्त पर भारी दबाव डाला है, लेकिन इसने महामारी से त्रस्त अर्थव्यवस्था को बढ़ावा भी दिया है।
आर्थिक विश्लेषक एकमत हैं कि अर्थव्यवस्था का तेजी से पुनरुद्धार हो रहा है। आधिकारिक दृष्टिकोण यह है कि अर्थव्यवस्था वी-आकार से बेहतरी की ओर बढ़ रही है, जबकि कुछ अन्य लोग यू आकार के पुनः प्रवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं। पुनः प्रवर्तन का आकार जो भी हो, अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से ठीक होने जा रही है। पुनः प्रवर्तन का एक कारण है मांग में तेजी। लॉकडाउन और उसके बाद आर्थिक गतिविधियों में गिरावट के कारण जो मांग गायब हो गई थी, वह वापस आ रही है। घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों के कारण भी सुधार अपेक्षा से अधिक तेजी से हो रहा है। तीसरे, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की नई नीति ने विशेष रूप से चीन से आयात को हतोत्साहित कर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया है। चौथी बात, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हम पाते हैं कि रिकवरी उम्मीद से ज्यादा तेज रही है। माना जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से आर्थिक सुधार और महामारी संबंधी बेरोजगारी में कमी हो सकती है।
चूंकि दुनिया ने एक सदी से अधिक समय बाद एक महामारी देखी है, इसलिए विकास दर में आई कमी को सामान्य रूप से देखना विवेकपूर्ण नहीं होगा। बेहतर तरीका यह है कि इस महामारी वर्ष को ‘शून्य वर्ष’ मान लिया जाए। वर्ष 2019-20 से डीपी वृद्धि की गणना करें, और वर्ष 2020-21 को छोड़ ही दें। कभी-कभी, हम एक ऐसी कालावधि में होते हैं, जिसे भूल जाना चाहते हैं। वर्ष 2020 भी ऐसा ही साल है। महामारी से नए सबक सीखते हुए, 2020 को पीछे छोड़ते हुए, एक बड़ी छलांग लगाने की जरूरत है। ग्रामीण स्तर पर डेयरी, पोल्ट्री, बागवानी, फ्लोरीकल्चर, बांस की खेती, कुटीर उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, उच्च मूल्य वाली फसलों और ग्राम स्तर पर अधिक और मूल्य वर्धन के साथ रोजगार सृजन करते हुए आत्मनिर्भर गांवों के एक नए युग में प्रवेश करने का यह समय है। एक नई व्यवस्था बनाई जाए, जहां हमारे ग्रामीण शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर न हों। अपना देश मैन्यूफैक्चरिंग में चीन या किसी अन्य देश पर निर्भर न हो। शून्य दोष और शून्य (पर्यावरण) प्रभाव के साथ हम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए विश्व स्तर का सामान बनाएं, जैसा कि प्रधानमंत्री कहते हैं। चीन से मोहभंग होने के बाद पूरी दुनिया विकल्प के रूप में भारत की ओर देख रही है। ऐसे में, संकट को अवसर में बदलने की जरूरत है।