कुंभ का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह नदियों के महत्व से जुड़ा हुआ समागम है। भारत के चारों प्रमुख कुंभ स्थलों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक) का संबंध नदियों से है। यह परंपरा समुद्र मंथन की गाथाओं से उत्पन्न हुई है, जिसमें जल को सबसे बड़ा तत्व माना गया है। जल न केवल हमारे शरीर का मुख्य घटक है, बल्कि पृथ्वी और समुद्र का भी मुख्य आधार है। यह जीवन का आधार है।
इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब भी ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों में जीवन की खोज की जाती है, तो हर ग्रह पर सबसे पहले जल की संभावना को तलाशा जाता है, क्योंकि जहां जल है, वहां जीवन है। यह भी सच है कि कुंभ की परिकल्पना सिर्फ एक धर्म विशेष के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए की गई थी। यह विचार ‘यत पिंडे, तत ब्रह्मांडे’ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि जो हमारे शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है। और हमारे शरीर में सबसे ज्यादा जल ही है, जो पृथ्वी में भी है।
आज के समय में कुंभ को वर्तमान संदर्भों में देखने की आवश्यकता है। यह पर्व नदियों के सानिध्य में मनाया जाता है, लेकिन नदियों के हालात दिन-प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं। अगर नदियां हमारे साथ नहीं रहीं, तो कुंभ के महत्व को भी ग्रहण लगेगा। प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के जीवन में नदियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं। इन नदियों में स्नान कर मोक्ष प्राप्ति की कल्पना की जाती है। लेकिन आज गंगा, यमुना और अन्य नदियों की स्थिति चिंताजनक है, जिनसे तरना कल कठिन हो जाएगा। आजकल की खबर है कि संगम के आगे पीछे नदियां मैली हैं और त्वचा से संबंधित शिकायतें भी आ रही हैं।
सोचिए चाणक्य ने कब कहा था, ‘क्लो दश सहसस्त्राणी हरीस्तये जयती, तदर्थ जानवी तोयम तदर्थ ग्राम देवता’ अर्थात कलयुग के दस हजार वर्ष पूरे होने पर विष्णु साथ छोड़ देंगे और उसके आधे में गंगा विलुप्त होना शुरू करेगी और उसके भी आधे में ग्राम देवता। और यह सब चाणक्य के लिए इसलिए कहना संभव था, क्योंकि वह मनुष्य की प्रवृत्ति को समझते थे।
आज का सवाल ही यह है कि क्या हम इन नदियों को बचा पाएंगे? क्या कुंभ जैसे महापर्व को निंदित कर देंगे, जब कुंभ जल में हम सब डुबकी लगा के तरना चाहते हों, तो इन नदियों की पवित्रता और अस्तित्व बनाए रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। जिस तरह करोड़ों लोग कुंभ में स्नान करने के लिए आते हैं, अगर ये ही नदियों की महत्ता को इस रूप में भी समझें कि इन्हें बचाना भी धर्म का हिस्सा है, और इसे संरक्षित करने के लिए प्रयास करें, तो कुंभ का असली उद्देश्य सफल हो जाएगा।
इतिहास गवाह है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने कुंभ की परिकल्पना में मानवता और प्रकृति का गहरा संदेश दिया था। आज जब सरकारें इस दिशा में असहाय नजर आती हैं, तो ऐसे में साधु-संतों और अखाड़ों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। महाकुंभ से जुड़े इन धर्म गुरुओं को आज नदियों की पवित्रता और संरक्षण का भी आह्वान करना चाहिए। कुंभ में करोड़ों लोगों का जुटना न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि आत्मीयता और समर्पण का भी। लेकिन यह पर्व केवल स्नान और मोक्ष तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यही समय है कि जब नदियों और जल से जुड़े मुद्दों पर गहन चर्चा और समाधान ढूंढने का भी प्रयत्न करना चाहिए।
आज यह स्पष्ट है कि अगर हम नदियों को संरक्षित नहीं करेंगे, तो कुंभ की पवित्रता भी कल खतरे में पड़ जाएगी। कुंभ का अर्थ ‘घड़ा’ है, जो जल और शरीर से जुड़ा हुआ है। मिट्टी से बने इस शरीर को जल की आवश्यकता है और यदि जल ही नहीं रहेगा, तो कुंभ के साथ जीवन भी असंभव हो जाएगा।
ऋषि-मुनियों और धर्म गुरुओं को कुंभ के इस महत्व को समझाते हुए समाज को नदियों की पवित्रता बनाए रखने के लिए जोड़ना होगा। उन्हें यह संदेश देना होगा कि नदियों को बचाने के काम से भी पुण्य जुड़ा है, ताकि इसमें भी कुंभ जैसा माहौल बन जाए। यह आह्वान कुंभ की पवित्रता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। कुंभ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व का भी पर्व है। ग्रहों और उनके प्रभावों का मानव शरीर पर जो प्रभाव पड़ता है, वह सभी धर्मों और समाजों से जुड़े लोगों को समान रूप से प्रभावित करता है। इसलिए कुंभ को एक सार्वभौमिक पर्व के रूप में देखा जाना चाहिए।
आने वाले समय में कुंभ और नदियों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास और जागरूकता की आवश्यकता है। यह पर्व न केवल भारतीय संस्कृति का गौरव है, बल्कि मानवता के लिए भी एक प्रेरणा है। यदि हम इस संदेश को समझकर नदियों को संरक्षित करने के लिए कदम उठाएं, तो कुंभ का असली उद्देश्य पूरा होगा। अब इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि इतने बड़े आयोजन को शांतिपूर्वक और कुशलता से निभाना ही राज्य और देश तथा हम सबके लिए गर्व का विषय है। इसके साथ ही राज्य सरकार ने इस अवसर पर कुंभ से जुड़े उक्त विषयों पर चर्चा करने का आह्वान भी किया है। उसका कारण यह भी हो सकता है कि यहां के राज्य प्रमुख योगी संत भी हैं, तो प्रकृति के पहरेदार भी।