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सिर्फ अभिशाप नहीं है आबादी

Wed, 10 Jul 2013 09:34 PM IST
रहीस सिंह
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आज से करीब 215 साल पहले 1798 में थॉमस माल्थस ने भविष्यवाणी की थी कि अनियंत्रित तरीके से बढ़ने वाली आबादी दुनिया को भुखमरी की तरफ धकेल कर उसे नष्ट कर देगी। माल्थस के इस कथन को अपरिवर्तित सत्य की तरह आज भी कुछ बुद्धिजीवी, विचारक, अर्थशास्त्री और नीतिकार सहेजे हुए हैं, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। विशाल मानव आकार को केवल भय बनाकर दुनिया के सामने पेश करना उचित नहीं। पर सात अरब के ऊपर पहुंच चुकी वैश्विक आबादी को नियंत्रित करने की भी जरूरत है।
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जनसंख्या वृद्धि से संबंधित एक सामान्य अनुमान यह है कि यदि दुनिया में औसत रूप से प्रत्येक महिला दो बच्चों को जन्म दे, तो जनसंख्या में स्थिरता आ सकती है। हालांकि वर्तमान प्रजनन दर के हिसाब से तो यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2100 तक दुनिया की जनसंख्या 15 अरब तक पहुंच जाएगी। इस कालखंड में ही दुनिया में सबसे ज्यादा प्रजनन दर माली, नाइजर और युगांडा जैसे गरीब देशों की होगी, जबकि जर्मनी, जापान और रूस जैसे देश कम प्रजनन दर वाले होंगे। इससे अमीर और गरीब देशों के बीच जनसंख्या का असंतुलन बहुत तेजी से बढ़ेगा, जो दुनिया को नए किस्म के संघर्षों की ओर ले जा सकता है।

इस बढ़ती हुई आबादी के खतरे तो हैं, लेकिन इसका एक और पहलू भी है। इस दिशा में यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रॉबर्ट एलिबर ने माल्थस द्वारा पैदा किए गए भय को खारिज किया है। उनका कहना है कि माल्थस की धारणा यदि पिछले 200 साल से गलत साबित हो रही है, तो अगले सौ साल में यह सही क्यों होगी? उनके मुताबिक, तकनीक के अबाध नवीनीकरण और उत्पादकता में बदलाव से वैसी स्थिति नहीं आने वाली, जिसका वर्णन माल्थस ने औद्योगिक क्रांति से पहले किया था। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विलियम ब्यूटर का भी मानना है कि यदि जनसंख्या के बोझ से दुनिया को बर्बाद होना होता, तो वह बहुत पहले ही हो चुकी होती।
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अगर भारत की बात करें, तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुमानित रिपोर्ट के अनुसार, 2028 तक देश की आबादी 1.45 अरब हो जाएगी। भारत इस समय दुनिया का सबसे युवा देश है। इसलिए कुछ विचारक हमारी आबादी को आर्थिक तरक्की के संसाधन के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि हद से ज्यादा जनसंख्या अर्थव्यवस्था पर बोझ होती है। हमारे देश में जनसंख्या का विशाल आकार गरीबी, कुपोषण, शहरीकरण और झुग्गी-झोपड़ियों का विस्तार कर रहा है। वैसे भी हमारे यहां कुपोषित और भूखे लोगों का 23 करोड़ 30 लाख का एक विशाल समूह है, लगभग 2.47 करोड़ लोगों के पास घर नहीं है और शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी आबादी के अलावा घोर विषमता भी मौजूद है।

लेकिन यह भी तथ्य है कि 2050 तक भारत में सौ करोड़ लोग काम करने की स्थिति में होंगे, जबकि इसके मुकाबले अमेरिका में 27 करोड़ और यूरोप में 45 करोड़ लोग ही होंगे। यानी उस समय भारत दुनिया में सबसे ज्यादा युवा शक्ति और संसाधन वाला देश होगा। बेशक इसका लाभ तभी मिल पाएगा, जब इस संपूर्ण मानव श्रम का समुचित प्रयोग हो सके। इसके लिए आर्थिक विकास के सभी घटकों में एक संतुलन साधना होगा, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घावधि निवेश की योजनाएं बनानी होंगी तथा आने वाले समय में देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना होगा। भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के संदर्भ में यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के प्रोफेसर लॉरेंस हैडाड कहते हैं, भविष्य में विश्व व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा और भारत में इस बदलाव के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार उसके लोग होंगे।

तात्पर्य यह कि जनसंख्या केवल अभिशाप नहीं है। गरीबी, भुखमरी अथवा कुपोषण केवल आबादी की विशालता के परिणाम नहीं होते, बल्कि बेहतर गवर्नेंस के अभाव और लोगों की निजी महत्वाकांक्षाओं तथा लोभ के नतीजे होते हैं। अगर ऐसा न होता, तो अमेरिका में मात्र 31.5 करोड़ आबादी के बावजूद 14 प्रतिशत गरीब न होते। इसका मतलब यह है कि गरीबी पूंजीपरस्त नीतियों का परिणाम अधिक है। पर इसका मतलब यह भी नहीं कि आबादी पर नियंत्रण के उपाय बिल्कुल न किए जाएं। यह आने वाले समय के लिए एक बड़ी चुनौती तो है ही।
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