जब से तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर के खिलाफ दस साल पहले की घटना का बयान करते हुए यौन प्रताड़ना का आरोप लगाया, तब से जैसे अंग्रेजी मीडिया की बांछें खिल गईं। कहा जाने लगा कि अंततः भारत का 'मी टू मूमेंट' आ ही पहुंचा।
जब अंग्रेजी मीडिया पर विद्वान इस मसले पर कई दिन से बहस कर रहे थे, तभी बिहार में एक स्कूल में पढ़ने वाली तीस लड़कियों को लड़कों और उनके परिवारों ने सिर्फ इसलिए पीटा और कई को बुरी तरह से घायल किया, क्योंकि उन्होंने इन लड़कों के खिलाफ छेड़खानी की शिकायत की थी। इस घटना की खबर बहुत ज्यादा नहीं दिखाई गई। उसका कारण हमारे चैनलों में छाई अंग्रेजी और प्रसिद्ध होने का जातिवाद है। जिसमें अगर आप कोई सेलिब्रिटी हैं और उस पर भी ऐसी कोई बात कर रहे हैं, जिसका संबंध सेक्स से जुड़ा हो, तो मीडिया को लगता है कि लोगों के देखने के लिए यह बहुत ही रसदार खबर है, जिसके जितने हिट मिलेंगे, उतनी ही टीआरपी बढ़ेगी।
पिछले लगभग एक महीने से चैनलों निहाल हुए जा रहे हैं। पहले समलैंगिक संबंधों का फैसला आया। फिर व्यभिचार संबंधी धारा 497 का फैसला आया। और अब मी टू हो गया। सब सेक्स से जुड़े हुए। अमेरिका में 'मी टू' एक साल पहले हो गया। तो हम क्या किसी अमेरिका से कम हैं। हम हर बात में क्यों पिछड़ें। अंततः हम आगे निकल ही गए।
अपने देश में लड़कियों को तरह-तरह की छेड़खानी का सामना करना पड़ता है। कोई भी राह चलता किसी लड़की पर उंगली उठा भर दे, तो उस लड़की का जीना दूभर हो जाता था। उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती थी। मगर लड़कों का कभी कुछ नहीं बिगड़ता था। आज भी बहुत से स्थानों पर ऐसा होता है।
लेकिन बदले वक्त और लड़कियों की शिक्षा, उनकी नौकरी, सड़कों, बाजारों, परिवहन, दफ्तरों में उनकी बढ़ती उपस्थिति ने उन्हें यह हिम्मत दी कि वे अपने प्रति हुए अन्याय के विरुद्ध बोल सकें। जो पुरुष लड़कियों के शरीर पर अपना मालिकाना हक जताते थे, उनके इस हक को चुनौती दी जाने लगी। यही कारण है कि यौन प्रताड़ना के लिए उच्चतम न्यायालय ने विशाखा गाइड लाइंस जारी की। दुष्कर्म और घरेलू हिंसा के खिलाफ भी कठोर कानून बने।
होना तो यह चाहिए था कि इन कानूनों से सताई गई स्त्रियों को न्याय मिलता। लेकिन एक तरफ तो यह देखने में आया कि साधन- संपन्न कानून को हर तरह से अपने पक्ष में मोड़ने में सफल होते हैं, तो दूसरी तरफ साधनहीन स्त्री की कानून तक कोई पहुंच नहीं। मीडिया से गरीब और परेशान औरतों की आवाजें बहुत दूर होती चली गई हैं। आम गरीब औरत क्या-क्या नहीं झेलती, मात्र दो वक्त की रोटी के लिए कितना हाड़-तोड़ परिश्रम करती है। उनके शोषण को देखकर कोई नहीं कहता कि आ गया गरीब औरत का 'मी टू'।
मी टू के अंतर्गत जिन औरतों के साथ अन्याय हुआ है, सताया गया है, उन्हें न्याय मिलना ही चाहिए। मगर बहसों में लोग कह रहे थे कि न्याय की प्रक्रिया बहुत लंबी है। एक वकील ने कहा कि प्रक्रिया से तो गुजरना होगा। दूसरे पक्ष की बात भी तो सुननी होगी। इस पर एक महिला वकील ने कहा कि एक औरत क्या झूठ बोलेगी। यानी कि किसी औरत ने कह भर दिया, तो क्या बिना किसी सुनवाई या कानूनी कार्यवाही के आप किसी को फांसी पर चढ़ा देंगे!
जांच एजेंसियों के उन आंकड़ों का क्या करेंगे, जिनमें बताया जाता है कि यौन प्रताड़ना और दुष्कर्म के आरोप बहुत बार किसी और बात का बदला लेने के लिए लगा दिए जाते हैं और झूठे होते हैं। लेकिन स्त्री विमर्श आजकल इतना निरंकुश हो गया है कि किसी और की बात सुनना ही नहीं चाहता। यह कैसे मान लिया जाए कि कोई स्त्री कभी झूठ नहीं बोलती।