आंकड़े अक्सर भरमाने वाले होते हैं, खासकर जब वे सरकारी हों। ऐसे आंकड़े किसी निश्चित उद्देश्य के तहत परोसे जाते हैं। और जब देश में गरीबी की बात हो, तो ये आंकड़े सरकारी दावों की पुष्टि करते नजर आते हैं कि गरीबी कम होती जा रही है।
योजना आयोग, जो अपने आंकड़ों के कारण हमेशा विवाद में रहता है, इस बार फिर कुछ नए आंकड़े लेकर आया है, जिन पर खासी बहस छिड़ी हुई है। उसका कहना है कि देश में पिछले एक दशक में गरीबों की संख्या में जबर्दस्त कमी आई है। 2004-05 में जहां देश में गरीबों की तादाद कुल जनसंख्या का 37.2 प्रतिशत थी, वह घटकर 2011-12 में 21.9 प्रतिशत रह गई। यानी सीधे 15 फीसदी की गिरावट।
योजना आयोग के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में 25.7 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं और शहरों में सिर्फ 13.7 प्रतिशत। गरीबी घटने के ये आंकड़े पिछले पांच सालों में एनएसएसओ के सर्वेक्षणों से लिए गए हैं, जो लोगों की खपत से जुड़े खर्च पर आधारित हैं। यानी लोगों की खपत करने की क्षमता कितनी बढ़ी।
इन आंकड़ों के मुताबिक, हर साल औसतन दो करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकाल लिए जाते हैं। गांवों में 816 रुपये प्रतिमाह से कम कमाने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे माना गया है और शहरों में 1,000 रुपये प्रतिमाह कमाने वाले उसके ऊपर हैं।
इन आंकड़ों से यह बात तो पता चलती है कि देश में गरीबी घटी है और यह बात काफी हद तक सही है। हालात में पहले से काफी सुधार हुआ है और अब वह भीषण निर्धनता और अभावहीनता कम दिखती है। गरीबों की तादाद में कमी भी आई है और लोगों के जीवन स्तर तथा रहन-सहन में सुधार भी दिखता है। अगर ध्यान से देखा जाए, तो आज पहले से बेहतर हालात दिखते हैं। सरकारी आंकड़ों पर अगर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि देश के गांवों में अब भी लगभग 27 करोड़ लोग गरीब हैं और शहरों में पांच करोड़ 31 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। यानी देश की कुल आबादी का एक चौथाई अब भी गरीब है।
इन आंकड़ों ने कई सवाल खड़े किए हैं, जिनमें सबसे बड़ा है कि इन आंकड़ों में कितनी सच्चाई है? दरअसल योजना आयोग ने इन आंकड़ों को पाने के लिए नए मानदंड का सहारा लिया है, जिससे आर्थिक मोर्चे पर सरकारी नीतियों की सफलता को दर्शाया जा सके। योजना आयोग का कहना है कि ये आंकड़े एनएएसओ के सर्वेक्षणों पर आधारित हैं। इस बार भी तेंदुलकर समिति के मानदंडों का ही सहारा लिया गया है, जिसकी रिपोर्ट पर पिछली बार काफी विवाद छिड़ा था।
हालांकि पिछली बार जो आंकड़े दिए गए थे, उनसे ये कहीं बेहतर हैं। लेकिन अब भी यह कहना कि गांवों में 27.2 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले और शहरों में प्रतिदिन 33.3 रुपये अर्जित करने वाले गरीबी रेखा में नहीं हैं, गले नहीं उतरता।
भारत में इस समय महंगाई का जो आलम है, उसमें ये आंकड़े भरमाने वाले ही तो हैं। अगर यह मान भी लें कि इतने में वे पेट भर लेंगे, तो इसके अलावा और भी जो आवश्यकताएं होती हैं, उनका क्या होगा? सिर्फ पेट भरना गरीबी से पार होने की परिभाषा है क्या? जिन्हें गरीबी रेखा के ऊपर माना जा रहा है, उन्हें क्या साफ पानी, सफाई, उनके बच्चों को शिक्षा, पौष्टिक आहार आदि मिल पा रहे हैं? अगर ये मूलभूत आवश्यकताएं पूरी नहीं हो रही हैं, तो कैसे मान लिया जाए कि वे गरीबी रेखा के पार हैं। यदि गरीबी दूर हो रही है, तो क्या रोजगार भी बढ़ रहे हैं?
इसका जवाब भी नहीं में है, क्योंकि देश में रोजगार के साधन बढ़ नहीं रहे हैं। और जब रोजगार ही नहीं बढ़ेंगे, तो गरीबी कैसे मिटेगी? यहां पर विरोधाभास दिखता है कि एक ओर रोजगार नहीं बढ़े, तो दूसरी ओर गरीबी तेजी से कम होने की बात कही जा रही है। दूसरी बात यह है कि इससे यह नहीं पता चलता कि ये लोग क्या लंबे समय तक गरीबी रेखा के ऊपर रहेंगे।
अगर हम आंकड़ों की ही बात करें, तो यह जानकर हैरानी हो सकती है कि चीन ने यहां भी हमें बुरी तरह मात दे दी है। 1981 में जहां चीन में 84 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, वहीं 2010 में यह संख्या महज 12 प्रतिशत पर जा पहुंची। चीन ने अपने देश में गरीबी दूर करने के लिए कई बड़ी और सफल योजनाएं चलाईं। उसने कृषि पर पूरा ध्यान दिया और उसमें बड़े पैमाने पर निवेश किया।
वहां सरकार ने लोगों को आगे बढ़ने का पूरा मौका दिया, जिसका फायदा पूरे देश को मिला। जिन जगहों पर गरीबी ज्यादा थी, चीन ने उन पर ध्यान केंद्रित किया और उसका कारण पता लगाकर बड़े पैमाने पर काम किया।
सरकारी तंत्र इस बात पर चाहे कितनी भी खुशी क्यों न जता ले कि देश में गरीबी कम हो रही है, यह बेहद निराश करने वाली बात है कि दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में ही रहते हैं। हम अगर आंकड़ों की बात करें, तो यह भी सच है कि 1981 में जहां दुनिया के 22 प्रतिशत गरीब भारत में थे, वहीं अब उनकी तादाद बढ़कर 33 प्रतिशत हो गई। ये चौंकाने वाले आंकड़े उस खुशी को छीन लेते हैं, जो देश में गरीबी कम होने की बात कहकर पाई जा रही है।
दरअसल आज भी विशाल जनसंख्या के भार को संभालने के लिए हमारे पास साधन और संसाधन नहीं हैं, और इसलिए गरीबी कम होने की बात कहना अर्थहीन-सा लगता है। यह एक राजनीतिक नारे से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि इससे किसी का कोई मकसद हल नहीं होने वाला।
एक और बात है। गरीबी रेखा का दायरा क्या हो, यह एक ऐसा सवाल है, जिस पर बहस करके कुछ मिलने वाला नहीं है। जरूरत है, उसे मिटाने के लिए बड़ी और सार्थक योजनाएं बनाने की। उससे भी बढ़कर उनका कार्यान्वयन करने की।