आनंद मोहन के प्रकरण से यही समझ में आता है कि हमारे राजनेताओं ने अभी हाल की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा है। कुछ दिनों पहले अतीक अहमद को लेकर पूरे देश में चर्चा बनी रही। लोगों ने देखा कि कैसे राजनीतिक संरक्षण के बल पर एक सामान्य परिवार का व्यक्ति न केवल हजारों करोड़ का मालिक बन गया, बल्कि आम लोगों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था। प्रयागराज और आसपास के जिलों में एक तरह से उसकी समानांतर सरकार चल रही थी। और यह सब इसलिए संभव हो सका, क्योंकि मुख्यमंत्री स्तर से उसको संरक्षण मिला हुआ था। 101 आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही थी। राजनीतिक संरक्षण में जब कोई अपराधी पनपता एवं फलता-फूलता है, तो स्थानीय अधिकारी उसके खिलाफ कार्रवाई करने में स्वयं को असहाय पाते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री ने उस पर सख्ती से कार्रवाई करके आम लोगों को राहत दी।
आनंद मोहन सिंह मामले से पहले बिलकिस बानो मामले के अपराधियों और राम रहीम के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इनकी जानकारी निकालिए, तो पता चलेगा कि जब-तब वे पेरोल पर बाहर निकल आते हैं। उनकी पेरोल की अवधि भी लंबी होती है। जेल में भी अगर ऐसे अपराधियों को सुविधाएं मिलती हों, तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं। चाहे बिलकिस बानो मामले के अपराधी हों, या राम रहीम या आनंद मोहन, ऐसा लगता है कि राजनेताओं ने ऐसा तरीका निकाल लिया है कि जिन अपराधियों से उन्हें राजनीतिक लाभ मिल सकता है, उनके लिए वे नियम-कानूनों में आवश्यक संशोधन कर देते हैं।
अंग्रेजी में एक कहावत है-'शो मी द पर्सन ऐंड आई विल शो यू द रूल' यानी व्यक्ति के मुताबिक हम कानून बना देंगे, ताकि उसे सजा न हो। यही हाल हम आनंद मोहन के प्रकरण में देख रहे हैं। बिहार जेल मैनुअल में यह प्रावधान था कि सरकारी अधिकारी की हत्या करने में दोषी पाए जाने वालों को कभी भी माफी नहीं दी जाएगी, लेकिन बिहार सरकार ने वह प्रावधान ही हटा दिया। कहने के लिए तो कहा जा सकता है कि बिहार सरकार ने 27 कैदियों की रिहाई के लिए कानून में बदलाव किया, जिसका फायदा आनंद मोहन को मिला। लेकिन वास्तविकता यह है कि आनंद मोहन की रिहाई के लिए कानून में बदलाव किया गया, जिसमें संयोगवश अन्य 26 लोग भी छूट गए।
नीतीश कुमार अगले लोकसभा चुनाव में विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं, और ऐसे नेता जब इस तरह का काम करते हैं, तो देश को लेकर चिंता होती है कि इस देश में आखिर हो क्या रहा है या आगे क्या हो सकता है। अभी अपराधियों के लिए संसद और विधानसभा के दरवाजे खुले हैं। आप चुनाव आयोग के पास जाएं, तो वह कहता है कि हम इसमें कुछ नहीं कर सकते। आप सुप्रीम कोर्ट के पास जाएं, तो वह कहता है कि यह कार्यपालिका का काम है, हम कुछ नहीं कर सकते।
कार्यपालिका यानी संसद, जहां 43 प्रतिशत आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग चुनकर गए हैं, से यह आशा करना कि वह अपराधियों के राजनीति में प्रवेश पर अंकुश लगाएगा, बेकार है। वे तो जानबूझकर ऐसे अपराधियों को टिकट देते हैं, जो चुनाव जीत सकते हैं और अपने जातिगत प्रभाव, धनबल एवं बाहुबल से पार्टियों को फायदा दिला सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट को ही इस दिशा में पहल करनी चाहिए, अन्यथा दुनिया हमारे लोकतंत्र पर हंसेगी।
अपराधियों को संरक्षण देना अच्छी प्रवृत्ति नहीं है, परंतु लगभग हर पार्टी ऐसा ही करती है। यही वजह है कि ज्यादातर पार्टियां आनंद मोहन की रिहाई का कोई खास विरोध करती नहीं दिखतीं। अगर राजनेताओं ने अपराधियों को संरक्षण देना बंद नहीं किया और अपराधियों का वर्चस्व लोकसभा और विधानसभाओं में इसी तरह बढ़ता रहा, तो देश का लोकतंत्र एक दिन बड़े खतरे में पड़ जाएगा।
-लेखक, उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी