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राजनीति में वानप्रस्थ की जरूरत

Tue, 04 Dec 2012 01:41 AM IST
सुरेंद्र कुमार (पूर्व राजनयिक)
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देश की समस्याओं का समाधान खोजने के लिए क्या रॉकेट वैज्ञानिकों की जरूरत है? पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ऐसा नहीं मानते। एक अन्य विदेश सचिव कंवल सिब्बल मानते हैं कि देश की मौजूदा परिस्थितियां इन संकटों का समाधान खोजने में विफल साबित हो रही हैं। वह हैरत जताते हैं कि मरीज को सर्जरी की जरूरत है और पेन किलर से काम चलाया जा रहा है!
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वहीं, राष्ट्रीय नवाचार परिषद के प्रमुख डॉ. सैम पित्रोदा कहते हैं कि हमारे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो देश की 10 लाख समस्याओं की सूची आपके सामने पेश कर दें, लेकिन उन लोगों को उंगलियों में गिना जा सकता है, जिनके पास इनका ठोस, व्यावहारिक और साध्य समाधान है। शीर्ष स्तर पर नेतृत्व की कमी, राष्ट्रीय चरित्र में अनुशासन का अभाव, अतृप्त तृष्णा, और लोगों के प्रति अति असंवेदनशीलता, अच्छे शासन का स्पष्ट अभाव, दूरदर्शी दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं का सूखा और नैतिक साहस वाले सामाजिक सुधारकों का अस्तित्व न होना साबित करता है कि देश के लिए कुछ अच्छा नहीं हो रहा है।

भ्रष्टाचार और बेहद बदनाम राजनेता इस समस्या के लक्षण के तौर पर सामने आ रहे हैं। नेतृत्व का अभाव और अन्य वर्णित लक्षण केवल कांग्रेस या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में ही नहीं है। मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों को सरसरी तौर पर देखने से पता चल जाता है कि वे सभी इस तरह की समस्या से अलग-अलग स्तर पर ग्रस्त हैं।
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लेकिन वे शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में सिर गड़ाए बैठी हैं और इस हकीकत को स्वीकार करने से इनकार करती हैं। गांधी-नेहरू वंश अब पुरानी बात हो गई है। नए राजवंश के रूप में बादल से लेकर मुलायम और करुणानिधि से लेकर शरद पवार तक का अभ्युदय हो चुका है। मौजूदा परिस्थितियों में तीन महिला नेत्रियों जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी पर अपने वंश को आगे बढ़ाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। यह अलग बात है कि उनके खास सहयोगी वंश की तरह ही बढ़ रहे हैं।
 
चीन में हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन को देखने से पता चलता है कि वहां के शीर्ष नेताओं की औसत आयु 60 साल से कम है। वहीं अपने यहां की बात करें, तो हाल ही में कैबिनेट में हुए फेरबदल के बाद केंद्रीय कैबिनेट की औसत आयु 65 साल है, जो कि सिविल सेवक की सेवानिवृत्ति की आयु से भी पांच साल अधिक है।

वैसे यह दिलचस्प है कि फेरबदल में युवा चेहरों को मौका देने का ढिंढोरा जोर-शोर से पीटा गया। भारत में बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख रहे वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली ने एक बार चुटकी ली थी कि भारत युवा देश है, मगर नेतृत्व बूढ़ों के हाथ में है। क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि जिस देश ने वानप्रस्थ का सिद्धांत दिया, आज वहां इस बारे में कोई बात भी करना नहीं चाहता।

वजह यह है कि राजनीति में लोगों को लगता है कि पता नहीं कब किसे प्रधानमंत्री की गद्दी संभालने के लिए कह दिया जाए। और फिर आप कुछ महीने भी उस कुरसी पर आसीन रह गए, तो इतिहास की किताबों में आपका एक पैराग्राफ दर्ज हो जाएगा। यही नहीं, जब तक आपकी सांस चलेगी एसपीजी के कमांडो आपकी सुरक्षा में डटे रहेंगे और सांस थम जाने के बाद राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार होगा। एक जिंदगी में कोई इससे ज्यादा आखिर क्या चाहता है? लेकिन यह कहना अनुचित होगा कि ऐसी महान जिंदगी की ख्वाहिश सिर्फ राजनेताओं के भीतर है। सिविल सेवक और प्रसिद्ध खेल हस्तियां भी इससे अछूती नहीं हैं।

बुजुर्ग राजनेताओं के राजनीतिक वानप्रस्थ का एक ही रास्ता है कि राजनीतिक दलों का कायाकल्प हो। नए विचारों और नए दृष्टिकोणों के साथ युवा नेताओं का अभ्युदय हो। साथ ही उच्च स्तर की पारदर्शिता और जवाबदेही लाई जाए। हमारे वरिष्ठ नेताओं को दक्षिण अफ्रीका के नेता नेलसन मंडेला का अनुकरण करना चाहिए और देश को आगे ले जाने के लिए नई पीढ़ी को मौका देने व एक अभिभावक के रूप में काम करने के लिए स्वेच्छा से परदे के पीछे चले जाना चाहिए।  

अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें शिष्ट तरीके से वानप्रस्थ में भेजने के लिए हर पार्टी के युवा ब्रिगेड को साहस, राजनीतिक चतुरता और कूटनीतिक कौशल का प्रदर्शन अवश्य करना चाहिए। रूजवेल्ट के बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इस पद पर दो बार से ज्यादा नहीं रहा।

कल्पना कीजिए कि अगर हम ऐसा कानून ले आएं कि किसी भी व्यक्ति के पास दो बार से अधिक राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री/सांसद बनने का अधिकार नहीं होगा, तो देश की राजनीति में कितना व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है। लेकिन यहां सवाल यही है कि बिल्ली के गले में आखिर घंटी बांधेगा कौन। पहल कौन-सा दल करेगा और उसे समर्थन कौन देगा?
वैसे अगर दो कार्यकाल की प्रणाली लागू कर दी जाए, तो नया नेतृत्व व शासन का नया तरीका आने के साथ ही राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक संपन्नता और वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी संबंधी उन्नयन को बढ़ावा मिलेगा। सवाल यह है कि अगर यह अमेरिका में हो सकता है, तो भारत में क्यों नहीं।

गांधी जी का वह चर्चित वाक्य जिसमें उन्होंने कहा था कि धरती हर व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लालच की नहीं, आज भी प्रासंगिक है। आम आदमी की मूल जरूरतों को लेकर उदासीनता और असंवेदनशीलता भयावह है। उभरते भारत की यह जमीनी हकीकत जानने के बाद कि देश के आठ करोड़ से ज्यादा रोजाना 30 रुपये से कम पर अपनी जिंदगी बसर करते हैं, अगर हमारे दिल में हलचल नहीं मचती है और हमारी अंतरात्मा हमें नहीं झिंझोड़ती है, तो जरूर मनुष्य के रूप में हमारे भीतर कुछ बुनियादी गड़बड़ियां हैं।
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