हमारा समाज बिखर रहा है। क्या इसलिए कि वह विकास की ओर अग्रसर है, या इसलिए कि मध्यवर्ग बढ़ा है और उसकी आय में इजाफा हुआ है? समाज का एक बड़ा हिस्सा निम्न मध्यवर्ग से उठकर सामान्य मध्यवर्ग में आ गया है। उसकी आकांक्षाएं बढ़ी हैं। जो अब भी निम्न आर्थिक स्थिति के चक्र में फंसा है, वह नाराज और कुंठित है। महंगाई ने उस नाराजगी को और अधिक हवा दी है। माना जा रहा है कि फुटकर बाजार के क्षेत्र में विदेशी हिस्सेदारी से लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। महंगाई और बढ़ेगी।
कई बार यह सवाल उठता है कि क्या नैतिक मूल्य अप्रासंगिक हो गए हैं। सत्ता असामान्य को सामान्य मानकर पेश करती है। जो नदियां बचपन में निर्मल थीं, तब वे हमारे लिए उत्सवा थीं, और जब प्रदूषित हैं, तो भी वे नदियां ही हैं। पहले लोगों का सामाजिक नजरिया था, वे गंगा और अन्य नदियों के प्रति एक सामाजिक नजरिया रखते थे। नदियों के किनारे बसे या यात्रियों की, गंगा या अन्य नदियों की सेवा, जीवन का अंग थी। वे साबुन से नदियों में नहाने को बुरा समझते थे। उनके लिए कोई भी अपवित्र वस्तु प्रवाहित करना एक तरह से वर्जित था, सिवाय अंतिम संस्कार से संबंधित उच्छिष्ट के या देवार्चना के बाद उतरे फूलों आदि के। लेकिन आजादी के बाद यह नजरिया बदल गया। नदियों के जल को वे मात्र ऐसा जल समझने लगे, जिसमें गंदगियां बहाकर अपने आपको स्वच्छ रख सकते हैं।
गंगा का ही उदाहरण लें, तो हर की पौड़ी पर पानी लाने के लिए महामना मालवीय जी के नेतृत्व में जो आंदोलन हुआ था, उसका आधार धार्मिकता के साथ सामाजिक दायित्व का निर्वाह भी था। ब्रिटिश सरकार के आदेश के खिलाफ सारे रजवाड़ों और समाज के मौजिज लोगों का इकट्ठा होना और हर की पौड़ी पर जल को आने से रोकने का विरोध राजनीतिक आंदोलन कतई नहीं था, बल्कि एक सामाजिक दायित्व का निर्वहन था। अब इस रूप में सामाजिक प्रतिरोध बंद हो गए। हर चीज राजनीतिक हो गई। पानी हो या पहाड़ हो या हवा हो, जंगलों और जनजातियों का दोहन और दलन अविकल रूप से हो रहा है।
माओवादियों का हिंसक हस्तक्षेप जनजातियों के अधिकारों के संरक्षण के बहाने बढ़ते जाना एक तरह की दमनात्मक राजनीति है। चाहे महंगाई हो या औद्योगिकीकरण की अफीम, सबका उद्देश्य है चंद लोगों या वर्गों का लाभ। शिक्षा की भी यही स्थिति है। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान का विकास न होकर पैकेज की दौड़ या अपनी तिजोरियां भरना है। प्राइवेट व्यावसायिक शिक्षा संस्थाएं चलाने वाले बहुत से लोग सामान्य स्थिति से उठकर अरबपति और करोड़पति हो गए। शिक्षा की कई श्रेणियां बन गई हैं। जो स्कूल भाषाई हैं, उनमें से सामान्यतः बाबू किस्म के लोग निकलते हैं या फिर चतुर्थ श्रेणी के अधिकारी।
अंगरेजी माध्यम के स्कूलों से बड़े बाबू, मझोले दरजे के अधिकारी या वह माल निकलता है जो बड़े संस्थानों जैसे आई आई टी, व्यावसायिक संस्थानों की ज़रूरत की पूर्ति करता है। जो बहुत मेधावी नहीं होते, उनके लिए आईटीआई या मझोले इंजीनियरिंग और व्यावसायिक संस्थानों की जरूरत पूरी करते हैं। वे कुकुरमुत्ते की तरह फैल रहे हैं। लाखों रुपये कैपिटेशन फी देकर मां-बाप अपने बच्चों को इंजीनियर या बिजनेस मैनेजमेंट एक्सपर्ट बनाने की आकांक्षा पूरी करते हैं, भले ही वे बाद में सेल्समैन बनें। बचपन से वे उन्हें सिखाते हैं कि वे इंजीनियर बनें, प्रबंधन में जाएं, आईएएस बनें। सपने देखना अच्छी बात है, पर सपने थोपना खतरनाक होता है।
जब वे दिखाए गए सपनों के अनुरूप नहीं बन पाते, तो जीवन भर के लिए हीनता की नाव में सवार होकर डूबते-उतराते रहते हैं। धनी बनने की जिस लालसा के बीज उनके मन में बोए गए थे, उसको वे रिश्वत लेकर या दहेज के लोभ में पत्नी पर अत्याचार ढाते हैं। कई बी.टेक बाइक लिफ्टिंग और चोरी-चकारी करते हैं। उनकी पूरी न होने वाली अपूर्ण इच्छाएं रोपे गए बम की तरह ऐसी विस्फोटक बनने लगती हैं कि सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। युवा वर्ग छोटे काम करने में अपमान समझता है, लेकिन नशेबाज़ी, चोरी-चकारी और हत्या करके जेल काटने में शहादत का मज़ा लेता है।
कुछ लोग मानते हैं कि जब देश का विकास होता है, तो वह संक्रमण काल होता है। अमेरिका में ऐसा हुआ। आज भी वहां काले नागरिक हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशन के बाहर चाकू या गन दिखाकर वसूली करते हैं। ऐसा न हो कि यह विकास हमारे देश को भी यह रवायत दे जाए, क्योंकि यहां मध्यवर्ग बढ़ रहा है, गरीबों की आबादी भी बढ़ रही है। यह कशमकश क्या रूप लेगी, उसका अंदाज ही लगाया जा सकता है। विकास के नाम पर क्या हम इस ओर से लापरवाह हो सकते हैं?