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पेरिस ओलंपिक: दो मांओं से सबक लें राजनेता; जरूरी है खेल कूटनीति को बचाकर रखना

मरिआना बाबर
Updated Fri, 23 Aug 2024 06:56 AM IST

सार

जहां राजनेता और कूटनीतिज्ञ विफल हो गए, वहीं रजिया परवीन और सरोज देवी सफल हुईं। वास्तव में इस खेल कूटनीति को बचाकर रखा जाना चाहिए। विभाजन के बाद भी अब जब भारत और पाकिस्तान दो पूर्णतः स्वतंत्र राष्ट्र बन गए हैं, हमारे ऐतिहासिक संबंध हमें अब भी बांधे हुए हैं।
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अरशद नदीम और नीरज चोपड़ा - फोटो : PTI


दिल्ली और इस्लामाबाद, दोनों जगहों पर उच्चायोग होने के बावजूद इन दो साधारण ग्रामीण महिलाओं ने जिस तरह दोनों तरफ नफरत और असहिष्णुता की दीवारें गिराकर प्यार और विश्वास का माहौल बनाया, वह दोनों मुल्कों के राजनयिक नहीं कर पाए। दिलचस्प बात यह है कि नीरज चोपड़ा और अरशद नदीम, दोनों ही पंजाबी हैं और बहुत अच्छे दोस्त हैं। दरअसल पाकिस्तान में मीडिया हमेशा अरशद नदीम से मैदान पर उनके भारतीय प्रतिद्वंद्वी नीरज चोपड़ा के साथ उनकी दोस्ती के बारे में पूछता रहता था और यह भी कि वे दोनों इतने अच्छे दोस्त कैसे बन गए। अपने-अपने मुल्कों के झंडों को अपने कंधों पर लपेटे हुए उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जिससे यह संदेश मिलता है कि भले ही आप दो अलग-अलग मुल्कों से हों, फिर भी आप दोस्ती का आनंद ले सकते हैं। क्या नीरज और अरशद के वर्षों से अच्छे मित्र बने रहने का कारण यह है कि वे दोनों पंजाबी हैं और अपनी मातृभाषा में बात करने से उनकी दोस्ती मजबूत हुई?

नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार करण थापर, जिन्हें पाकिस्तान में उनके लेखन और टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, ने इस पर कुछ टिप्पणियां की हैं। उन्होंने कहा कि दोनों माताओं के बीच अपने बेटे के प्रतिद्वंद्वी के प्रति इतना प्यार इसलिए दिखा, क्योंकि वे दोनों पंजाबी हैं और यह जातीयता उन्हें एक साथ ले आई। उन्होंने बेहद खूबसूरत लफ्जों में कहा कि 'वे अपने बेटे के प्रतिद्वंद्वी को प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं देखती हैं, क्योंकि उन्हें 'पंजाबी' जुड़ाव महसूस होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह उनके बोलने के तरीके में उल्लेखनीय समानता को स्पष्ट करता है। अरशद की मां रजिया परवीन ने कहा, 'मैं भी नीरज के लिए प्रार्थना करती हूं, वह भी हमारे बेटे जैसा है।' नीरज की मां सरोज देवी ने भी लगभग यही बात कही, 'जिसने स्वर्ण पदक जीता, वह भी हमारा बच्चा है और जिसने रजत पदक जीता, वह भी हमारा बच्चा है।'


किसी ओलंपिक में दशकों बाद पहला स्वर्ण पदक जीतने के बाद पाकिस्तान अब भी जश्न मना रहा है। जैवलिन एथलीट अरशद नदीम का अब भी पाकिस्तान में स्वागत किया जा रहा है। बहुत से लोग उन्हें पैसे, घर, कार और जमीनों से नवाज रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने राजकीय भोज में उनके परिवार को शामिल करने के लिए एक विशेष विमान उनके पंजाबी गांव मियां चन्नू भेजा। राष्ट्रपति, सेना प्रमुख, मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों समेत सभी प्रमुख व्यक्तियों ने उनके स्वागत के लिए कार्यक्रम आयोजित किए। लेकिन इन सब पर भारी रजिया परवीन और सरोज देवी रहीं, जो वहां सफल हुईं, जहां राजनेता और कूटनीतिज्ञ विफल हो गए। वास्तव में इस खेल कूटनीति को बचाकर रखा जाना चाहिए और कभी भूलना नहीं चाहिए। 


उल्लेखनीय है कि विभाजन के बाद भी अब जब भारत और पाकिस्तान दो पूर्णतः स्वतंत्र राष्ट्र हैं, फिर भी हमारे ऐतिहासिक संबंध, जो हमें अब भी बांधे हुए हैं, कभी-कभी सामने आ जाते हैं। इस संबंध में हाल ही में द न्यूज इंटरनेशनल में जनरल एल एड्रोस के पोते की एक चिट्ठी प्रकाशित हुई है, जिसने पुरानी यादें ताजा कर दीं। हो सकता है, अमर उजाला के बुजुर्ग पाठकों को स्वर्गीय मेजर जनरल सैयद अहमद अल एड्रोस याद हों, जिनका जुलाई 1962 में बंगलूरू में निधन हो गया था। उनका संबंध भारत के उस प्रांत से है, जो बिरयानी के लिए मशहूर है। जी हां, वर्ष 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के समय वह हैदराबाद राज्य बल के कमांडर-इन-चीफ थे। लेकिन 13 सितंबर, 1948 को जवाहरलाल नेहरू ने ऑपरेशन पोलो का आदेश दिया। और भारतीय सेना को हैदराबाद के निजाम के राज को खत्म करने में सिर्फ चार दिन लगे थे। 17 सितंबर को निजाम की सेना के कमांडर मेजर जनरल सैयद अहमद एल एड्रोस ने हार स्वीकार कर ली और आत्मसमर्पण कर दिया। जनरल अल एड्रॉस ने भारत में ही रहने का फैसला किया, जबकि उनके तीन बच्चों ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया, और दिलचस्प बात यह है कि वे मेरे परिवार के बहुत करीबी दोस्त बन गए। वास्तव में जनरल अल एड्रोस की एक पोती और मैं एक साथ बड़ी हुई और हम सबसे अच्छे दोस्त थे। 


अपने पत्र में अल एड्रोस की तीसरी पीढ़ी यानी उनके पोते ने लिखा है, 'कई वर्षों से भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान में खेलने नहीं आई है। इसलिए रिश्तों में जमी इस बर्फ को पिघलाने और खेल भावना को जिंदा रखने के लिए पाकिस्तान की सरकार को भारतीय खिलाड़ी नीरज चोपड़ा और उनके परिवार को पाकिस्तान आने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। इस यात्रा कार्यक्रम में अरशद नदीम के गांव मियां चन्नू को भी शामिल किया जा सकता है, ताकि दोनों के माता-पिता एक-दूसरे से मिल सकें और एक-दूसरे का अभिवादन कर सकें। हमें नीरज चोपड़ा की मां की सराहना करनी चाहिए, जिन्होंने जैविलन थ्रो में अरशद नदीम से अपने बेटे की हार के बाद भी कहा था कि वह नीरज के रजत पदक जीतने से खुश हैं, स्वर्ण पदक जीतने वाला अरशद नदीम भी हमारे बेटे जैसा ही है और ओलंपिक में पहुंचने वाले सभी लोगों ने कड़ी मेहनत की है।'


भारत और पाकिस्तान, दोनों सरकारों को इन दोनों खिलाड़ियों और उनके परिवारों को राजकीय अतिथि के रूप में अपने-अपने देशों में आमंत्रित करना चाहिए। मैं अपने भारतीय पाठकों को आश्वस्त कर सकती हूं कि नीरज चोपड़ा का पाकिस्तानियों द्वारा एक नायक के रूप में स्वागत किया जाएगा और दोनों माताएं इतिहास रचेंगी। इंशाल्लाह!
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