राजनीतिक विकल्प शून्य वर्तमान बंगाली समाज में मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने भी विरोध को समाप्त करने के ठीक उन्हीं तरीकों को अपनाना शुरू किया है, जिन्हें वामपंथी अपनाया करते थे। नतीजा यह है कि एक तरफ पार्टी के भीतरी ढांचे में घुटन पैदा हो गई है, वहीं राज्य में विकासहीनता गंभीर होती जा रही है।
विगत ढाई वर्ष के शासनकाल में सरकार के पास गिनाने के लिए एक भी उपलब्धि नहीं है। पार्टी के भीतर दरार भी इन दिनों चर्चा का विषय है। दिग्गज नेता सौमेन मित्रा पार्टी से निकलने वाले हैं। वह अगर अपने पुराने घर कांग्रेस में लौटते हैं, तो इसकी प्रतिक्रिया में तृणमूल में व्यापक टूट-फूट होगी। यह आशंका विगत कई महीनों से कायम है। दलबदल नहीं हो पा रहा है, तो इसका मुख्य कारण कांग्रेस की अनिश्चित स्थिति है। अभी जो तैयारियां चल रही हैं, उसके बारे में तृणमूल के एक गुट का मानना है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में गठबंधन या सीटों का तालमेल कर सकती है। अगर गठबंधन नहीं होता है, तो तृणमूल के कई नेता कांग्रेस में शामिल होंगे। क्योंकि गठबंधन की सूरत में कई नेता अपनी मनोवांछित सीट से हाथ धो बैठेंगे।
ममता बनर्जी दार्जिलिंग समस्या को सुलझाने का लगातार दावा कर रही हैं, पर वह समस्या सुलझी नहीं है, बल्कि ले-देकर कुछ दिनों के लिए दबा दी गई है। समस्या का मूल कारण तो गोरखा पहचान को मंजूरी दिए जाने की मांग है। यह मंजूरी दोधारी तलवार है। अगर गोरखा शिनाख्त को मंजूरी दे दी जाती है, तो उनकी महत्वाकांक्षाएं और बढ़ेंगी, जो अलगाववाद को बढ़ावा देंगी, और अगर मंजूरी नहीं दी जाती, तो यह भविष्य के आंदोलनों को हवा देगी।
पश्चिम बंगाल का विकास रुका हुआ है और मुख्यमंत्री इमामों को पेंशन देने और बॉलीवुड सितारों के स्वागत-सत्कार जैसे मदों पर धन खर्च कर रही हैं। राजनीतिक गुंडागर्दी के कारण प्रतिरोधहीन हुआ बांग्ला समाज समन्वित विकास के अभाव में कुंठित हुआ जा रहा है। खुद ममता बनर्जी सत्य-असत्य के खेल में फंसती जा रही हैं। वह मंच पर भाषा से खेलती हैं और बाद में फंसती हैं। वह यह भूल गई हैं कि वाम मोर्चे के अत्याचारों से तंग आकर लोगों ने उनको जिताया था। लोगों ने सोचा था कि उनके नेतृत्व में राज्य सरकार लोकतांत्रिक मान-मर्यादाओं का पालन करते हुए काम करेगी। राज्य में कानून-व्यवस्था का शासन स्थापित होगा और मस्तानों-दादाओं के राज की विदाई होगी। लेकिन ममता बनर्जी की अराजक कार्यशैली ने इन सपनों को नष्ट किया है। एक वर्ग हालांकि अब भी आस लगाए बैठा है कि वह अपनी कार्यशैली सुधारें। लेकिन ममता का निरंकुश मन नियंत्रण में काम करने को तैयार नहीं लगता।
वह भूल गई हैं कि मुख्यमंत्री के तंत्र का सारा हिसाब विभिन्न खातों में दर्ज होता है। तृणमूल कांग्रेस की नेत्री के तौर पर वह मनमाने खर्च करने को स्वतंत्र थीं। पर मुख्यमंत्री के पास यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। बेशक उनके पास अबाध अधिकार हैं, लेकिन इन अधिकारों के उपयोग-दुरुपयोग का हिसाब रहता है। उनके काम का अन्य संस्थाएं मूल्यांकन करती हैं। यही वह बिंदु है, जहां ममता फंस गई हैं।
मुख्यमंत्री इन दिनों सामाजिक अवसाद को आनंदोत्सव के माध्यम से मिटाना चाहती हैं। इसलिए दिवाली के कुछ ही दिन पहले उद्योगपतियों की बैठक और दिवाली के ठीक बाद कोलकाता फिल्म महोत्सव का आयोजन हुआ। छठ पर्व में उनकी सक्रिय भागीदारी और घाटों पर जाकर व्यवस्था देखना, साथ ही, फिल्म महोत्सव में अमिताभ, शाहरुख, कमल हासन और अन्य कई सितारों के आने का धुआंधार प्रचार, सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट के भगवान के तौर पर विज्ञापित किया जाना और उनकी आवभगत कुछ ऐसी कि सचिन खुद खिन्न हो उठे। इससे क्या संदेश जाता है?
ममता सरकार का बुनियादी लक्ष्य है राज्य के उद्योग को चंगा करना। इसके लिए वह नए और बदले मिजाज में नजर आ रही हैं और तनाव के सवालों से कन्नी काट रही हैं। जबकि स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है कि मुख्यमंत्री खुद को विकास के सवालों पर केंद्रित करें। हालांकि राज्य के राजनीतिक वाम स्वर को मद्धिम करने के लिए ममता का आनंद राग मददगार साबित हो सकता है। साथ ही, इससे विरोधी मीडिया का असर कम करने में भी मदद मिलेगी। विगत 29 अक्तूबर की बैठक में मौजूद उद्योगपतियों के मन में ममता-विरोधी मीडिया उन्माद का दबाव था, जिसके कारण वे मुख्यमंत्री से सीधे सवाल करने से कन्नी काट रहे थे। इससे यह भी पता चलता है कि राज्य सरकार ने ठीक से मीडिया प्रबंधन नहीं किया है। पिछली वाम मोर्चा सरकार को भी मीडिया विरोध का सामना करना पड़ा था, जिसका लाभ ममता को मिला था। पश्चिम बंगाल में मीडिया हमेशा राज्य के खिलाफ आक्रामक रहा है, जो राज्य के विकास में बाधाएं खड़ी करता है।
मीडिया की इसी नकारात्मक भूमिका को व्यर्थ करने के लिए पहले कांग्रेस, फिर कम्युनिस्ट और अब तृणमूल ने आतंक के बल पर सामाजिक प्रतिरोध को समाप्त कर दिया है। राजनीतिक लाभ के लिए यहां की सभी पार्टियों के नेता गुंडों को आश्रय देते हैं और उनसे मदद लेते हैं। यदि सरकार ऐसे तत्वों पर अंकुश लगा ले, तो राज्य में न केवल औद्योगिक वातावरण सुधरेगा, बल्कि स्वस्थ राजनीतिक विकल्प भी पैदा होंगे। पर ऐसा होना मुमकिन नहीं लगता। ऐसे में, सत्ताधारी तृणमूल के खिलाफ जनाक्रोश भले ही बढ़ता जाए, लेकिन फिलहाल उसका कोई विकल्प नहीं दिखता। और यही पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी विडंबना है।