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सूचना अधिकार कानून के दायरे में

Wed, 16 Oct 2013 06:17 PM IST
शंकर शरण
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राहुल गांधी ने राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाने का संकेत दिया है। यदि ऐसा होता है, तो यह अपराधियों को विधायिका में बने रहने वाले अध्यादेश को ‘फाड़ डालने’ से बड़ी बात होने वाली है। यह पूरी राजनीतिक प्रणाली पर गंभीर प्रभाव डालने वाला कदम होगा। राजनीतिक दल अपने को ‘स्वैच्छिक’ संगठन कहते हैं। मगर इसमें चतुराई है। यह संविधान के 52वें संशोधन (1985) को छिपाता है। यदि वे ‘स्वैच्छिक’ संगठन हैं, तो वह संशोधन अवैध है, क्योंकि उस संशोधन ने राजनीतिक दलों को संसद में एक विशिष्ट अधिकार देकर राज्य-तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया। वह है विधायिका में अपने दलीय सदस्य के कार्य, विचार पर कानूनी अंकुश रखना। इसके होते राजनीतिक दलों को स्वैच्छिक संस्था माना ही नहीं जा सकता।
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पहले सांसद अपने विवेक से सरकार के कामकाज पर बोलते थे। उनके दल की नीति का प्रभाव बाध्यकारी नहीं था। यानी, सियासी दलों के स्वैच्छिक संगठन होने के अनुरूप था। पर 52वें संशोधन ने सांसदों को कानूनी रूप से बाध्य किया कि वे अपने दल का आदेश मानें। अब यह किसी कांग्रेस या भाजपा सांसद की ‘स्वेच्छा’ नहीं कि वह मनमोहन सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का विरोध करे।

ध्यान दें, संविधान ने राजनीतिक दलों को कोई भूमिका नहीं दी थी। वैसे भी, सांसदों-विधायकों का निर्वाचन एवं विधायिका की कार्यवाही बिना किसी राजनीतिक दल के भी चल सकती है। किसी चुनाव में सभी या अधिकांश निर्दलीयों की जीत भी संभव है। विधानसभा फिर भी गठित होगी। सरकार फिर भी बनेगी। तब सांसद/विधायक की जिम्मेदारी संसद या विधानसभा के प्रति न होकर उस राजनीतिक दल के प्रति कैसे होगी, जिसका वह सदस्य है? लेकिन 52वें संशोधन ने यही कर किया।
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यह दल-विरोधी कानून था। तब से किसी सांसद या विधायक द्वारा दल का त्याग करने, उसके निर्देश की अवहेलना कर सदन में वोट करने आदि कारणों से उसकी सदस्यता खत्म करने का प्रावधान किया गया। उस संशोधन को अलग अनुसूची में डालते हुए उसके 7वें पैराग्राफ में यह भी जोड़ा गया था कि सदन की सदस्यता खत्म करने वाले इन प्रावधानों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 में ‘किहोतो होलोहोन बनाम जाचिल्हू एवं अन्य’ मुकदमे में उस पैराग्राफ को निरस्त घोषित किया, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 368 (2) के अनुरूप उसका विधिवत अनुमोदन नहीं हुआ था। अतः दल-बदल या दलीय आदेश की अवहेलना से किसी की संसद-सदस्यता खत्म होने वाली बात पर न्यायालय में विचार हो सकता है।

मूल संविधान में संसद सदस्य, विधानमंडल सदस्य, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, मंत्री या राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल आदि सभी पदों से संबधित विवरणों में ‘कोई व्यक्ति’, ‘कोई सदस्य’ शब्दों का प्रयोग है। क्या संविधान निर्माता ‘राजनीतिक दलों’ के अस्तित्व से अपरिचित थे? जाहिर है कि वे हरेक पद पर व्यक्ति की जिम्मेदारी को महत्व दे रहे थे। ऐसे में दल-बदल कानून के बहाने एक ‘स्वैच्छिक’ संस्था राजनीतिक दल को संसदीय कार्रवाई में निर्देशक शक्ति देना संविधान का तख्ता-पलट जैसी बात हुई! राजनीतिक दलों को संसदीय मामलों में सर्वोच्च शक्ति प्रदान कर देने के क्या-क्या निहितार्थ बने, इन पर विचार होना चाहिए। निर्वाचित विधायक सदन का नेता चुनने के अपने संविधान प्रदत्त अधिकार का भी उपयोग नहीं कर सकते! क्योंकि पार्टी का निर्देश मिलता है कि फलां को चुनो।

इसीलिए 52वां संशोधन असांविधानिक है, क्योंकि उसने पार्टियों को संविधान के निर्देशों से भी ऊपर शक्ति दे दी। यह गलत तो था ही, दलों को यह अधिकार देना हानिकारक भी हुआ। उसने कार्यपालिका और विधायिका को अनावश्यक बाधाओं में उलझा दिया। सांसद से लेकर मंत्री तक देशहित के कई काम इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि उन पर दलीय जबर्दस्ती लागू है। आंध प्रदेश का विभाजन इसका नवीनतम उदाहरण है। यह निर्णय एक राजनीतिक दल ने लिया है! तब राजनीतिक दल को ‘स्वैच्छिक’ संस्था कहना एक मजाक ही है। समय आ गया है कि विधायिका व सरकार के कार्यों को दलीय शिकंजे से मुक्त किया जाए।
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