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हालात: सियासी अराजकता की आग में जलते हुए गृहयुद्ध की ओर पाकिस्तान

मरिआना बाबर
Updated Fri, 12 May 2023 06:42 AM IST

सार

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान रिहा भले ही हो गए हैं, लेकिन पाकिस्तान जिस स्थिति की ओर बढ़ गया है, उससे निकलना उसके लिए आसान नहीं होगा। भीड़ द्वारा सेना को इस तरह निशाना बनाने की बात सोची नहीं जा सकती थी।
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पाकिस्तान में हिंसा - फोटो : सोशल मीडिया


प्रांतीय राजधानी लाहौर के एक सबसे व्यस्त इलाके में अनायास भड़क उठी भारी भीड़ ने बगैर किसी प्रतिरोध के लाहौर के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल सलमान फैयाज गनी के सरकारी आवास पर धावा बोल दिया। लाठियों से लैस भीड़ ने सब कुछ तोड़ना शुरू कर दिया और एक वरिष्ठ जनरल के घर के शानदार परिवेश को कैमरे में दिखाते हुए एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना शुरू कर दिया। इसने मुझे श्रीलंका की घटना की याद दिला दी, जब वहां भीड़ राष्ट्रपति भवन में घुस गई थी। हैरानी की बात तो यह थी कि भीड़ द्वारा वरिष्ठतम जनरल के सरकारी आवास पर हमला बोलने के बावजूद सेना द्वारा कोई प्रतिरोध नहीं किया जा रहा था। कोर कमांडर के घर में रहने वाला एक भी आदमी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। यहां तक कि वहां बड़ी तादाद में रहने वाले कर्मचारी भी नहीं दिख रहे थे। वहां कहीं कोई सुरक्षा नहीं थी, जो उस परिसर की रक्षा करती। आखिर क्या हो गया था? कुछ खबरों के मुताबिक, कोर कमांडर, उनके परिवार और सभी कर्मचारी कुछ दिन पहले ही कहीं और चले गए थे।


लाहौर और पूरे पाकिस्तान में, खासकर हर बड़े शहर में यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान की गिरफ्तारी का परिणाम थी, जिन्हें मंगलवार को इस्लामाबाद उच्च न्यायालय के परिसर से भ्रष्टाचार के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। क्या इमरान खान और पीटीआई के कुछ शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार करने की योजना तब बनी, जब सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ देश से बाहर थे?


मैं रावलपिंडी में सैन्य मुख्यालय (जीएचक्यू) के बहुत करीब रहती हूं और ड्राइविंग करते हुए कोई भी सत्ता के इस केंद्र के मुख्य द्वार के पास से गुजरता है। यहां स्टील के फाटकों के अंदर सुरक्षा की कई परतों के साथ भारी पहरा होता है, जिसे बाहर से देखा जा सकता है। इस इलाके में सुरक्षा वाहन में रैपिड मोबाइल फोर्स घूमती रहती है। दुनिया भर के सैन्य मुख्यालय जैसे परिसर के भीतर थल सेना अध्यक्ष और उनके वरिष्ठ कमांडर मौजूद रहते हैं। लेकिन मंगलवार को वहां अलग ही और अविश्वसनीय नजारा था, जब बड़ी तादाद में महिलाओं के साथ भारी भीड़ मुख्यालय के भीतर घुसने की कोशिश कर रही थी। आसानी से देखा जा सकता था कि गेट अंदर से सुरक्षित नहीं था। जरा-सा हिलाने के बाद गेट खुल गया और भीड़ भीतर घुस गई। लेकिन वे बहुत दूर तक नहीं गए और नारेबाजी करते हुए बाहर निकल आए। आखिरकार बुधवार को इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशन के महानिदेशक ने लंबे बयान के जरिये पलटवार करते हुए कहा, 'सेना ने अत्यधिक धैर्य, सहनशीलता और संयम दिखाया और अपनी प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना व्यापक देशहित में बहुत धीरज से काम लिया।'


इससे उस घटना की याद ताजा हो उठी, जब 10 अक्तूबर, 2009 को तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान और लश्कर-ए-झांगवी के 10 सदस्यों ने सेना की वर्दी पहन और सैन्य वाहन चलाकर आसानी से इस गेट को पार किया था। जब गोलियों की आवाज सुनाई दे रही थी, तब सेना प्रमुख अपने दफ्तर में थे, लेकिन तुरंत उन्हें सुरक्षित क्षेत्र में ले जाया गया था। लड़ाई सुबह तक जारी रही थी, जिसमें सभी आतंकवादी मारे गए थे, लेकिन अधिकारियों और नागरिकों की भी जान गई थी। उस हमले के बाद सैन्य मुख्यालय के मुख्य प्रवेश द्वारा की सुरक्षा दुरुस्त की गई और उसे और मजबूत बनाया गया।


बुधवार को सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ, दोनों अपने विदेश दौरे से लौट आए और पीटीआई को उन्होंने सख्त संदेश दिया। इससे पहले सभी प्रांतीय सरकारों और इस्लामाबाद के सांसदों ने संविधान के तहत पुलिस और रेंजरों के साथ सेना को सहायता के लिए बुलाया। इमरान खान के खिलाफ कई मजबूत मामले दर्ज हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हर मामले में जमानत दे दी है और कुछ मामलों को तो खारिज भी कर दिया है, जबकि अन्य मुकदमों में सुनवाई के लिए लंबी तारीखें पड़ रही हैं। यह सबको मालूम ही है कि सुप्रीम कोर्ट और उसके कुछ न्यायाधीश इमरान खान का समर्थन कर रहे हैं।


इमरान खान को राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) ने दरअसल एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया था, जिसमें पीटीआई प्रमुख गिरफ्तारी से बच रहे थे। उन्हें अल-कादिर ट्रस्ट से संबंधित मामले में गिरफ्तार किया गया, जिसमें खुद वह, उनकी पत्नी बुशरा बेगम और अन्य पीटीआई नेता 19 करोड़ जीबीपी (ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग) की एक बड़ी राशि के घोटाले में शामिल थे। ये रुपये लंदन की राष्ट्रीय अपराध एजेंसी से पीटीआई सरकार को भेजे गए थे। राष्ट्रीय अपराध एजेंसी को ये रुपये मिले थे, लेकिन उसे सरकारी खजाने में डालने के बजाय तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक दिग्गज और प्रभावशाली रियल एस्टेट मालिक मलिक रियाज को दे दिया था।
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एक और मामले में इमरान खान पर तोशाखाना से तोहफे लेकर सरकार के पास जमा करने के बजाय बाजार में बेचने का आरोप है, जिसमें उन्हें जमानत मिली है। तीसरा मामला हलफनामे में झूठ बोलने का है, जिसमें चुनाव प्रपत्र भरते समय उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी एक बेटी भी है, जिसका नाम टायरन व्हाइट है। और भी कई मामले हैं, जिसके तहत उन्हें पहले गिरफ्तार किया जा सकता था। क्या अब वक्त आ गया है कि इमरान खान को एक आम अपराधी की तरह अदालत में पेश किया जाए? आने वाले दिन शायद ये साबित करेंगे कि पाकिस्तान के हालात राजनेताओं के काबू से बाहर चले गए हैं।

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