लोकतंत्र में किसी आदमी का थानेदार हो जाना ही बहुत महत्वपूर्ण होता है। पर थानेदार का कुत्ता होने का सौभाग्य भी कई जन्मों के पुण्यों के बाद ही मिलता है। यह कुत्ता भी मालिक की तरह किसी की परवाह नहीं करता। थानेदार जब अपनी मूंछ पर बल दे रहा होता है, तब कुत्ता भी अपनी पूंछ भरसक टेढ़ी कर यह जता रहा होता है कि वह ऐरा-गैरा कुत्ता नहीं है।
गली के दूसरे कुत्ते ही नहीं, स्टाफ के कई लोग भी थानेदार के कुत्ते से ईर्ष्या करते हैं। ऐसा कम ही होता है कि थानेदार अपने हिस्से में से कोई टुकड़ा किसी दूसरे प्राणी के लिए निकालने की परवाह करे। लेकिन पालतू कुत्ते के सामने आते ही थानेदारी की अकड़ खत्म हो जाती है।
थानेदार प्लेट में रखी रोटी का एक बड़ा टुकड़ा अपने अर्दली को इस हिदायत के साथ सौंपते हैं कि वह अपने हाथों से कुत्ते को रोटी खिलाए। जिस अर्दली को यह सुख प्राप्त होता है, वह कुछ इस अंदाज में कुत्ते को रोटी खिलाता है, मानो इसके बाद ही उसका मनुष्य जीवन सार्थक हो सकेगा। थानेदार का कुत्ता पूंछ हिलाता है, तो इलाके में अमन-चैन बना रहता है। थानेदार का कुत्ता यदि रात में रोने लगे, तो किसी न किसी को दिवंगत होना ही पड़ता है।
पिछले दिनों मेरे शहर के एक थानेदार का कुत्ता चोरी चला गया। लोगों के सामान चोरी हो, तो यह एक सामान्य घटना है, पर कोई इलाके के थानेदार का कुत्ता ही चोरी कर ले, तो इसे व्यवस्था के लिए चुनौती समझा जाता है। लोकतंत्र में व्यवस्था सब कुछ सह सकती है, लेकिन चुनौती नहीं। न जाने कितने चोरों और मक्कारों ने थाने में पुलिस वालों के साथ बैठकर चाय-नाश्ता किया होगा। उस आवभगत का यह सिला?
कहां मामूली बातों पर अपना ईमान बिगाड़ने वाले देसी आदमी और कहां बड़े-बड़े मामलों की जांच के बदले मिले धन से महंगे बिस्कुट खाने वाला विदेशी नस्ल का कुत्ता? थाने में तैनात सारा अमला मुस्तैद हो गया। जिस-जिस गली में कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनाई दी, उस-उस तरफ वाहन दौड़ पड़े।
लगभग एक सप्ताह बीत गया है। सारा इलाका कुत्ते के गम में डूबा हुआ है। यही हाल रहा, तो थाना सूखकर कांटा न हो जाए कहीं! सुना है कि पुलिस शहर में कुत्ता चोरों के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने वाली है। ऐसे में जो लोग दूसरे अपराधों की रिपोर्ट लिखवाने के मूड में हैं, उनसे आग्रह है कि कुछ दिन संयम से काम लें।