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देहभाषा पढ़ने में माहिर पुलिस

विभूति नारायण राय
Updated Mon, 28 Aug 2017 10:47 AM IST
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विभूति नारायण राय
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद पंचकूला और सिरसा में जो हिंसा हुई, उसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। इसके पहले के दो मौकों-बाबा रामपाल की इन्हीं परिस्थितियों में गिरफ्तारी और जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान, पर भी  हरियाणा सरकार खुद तो डूबी ही थी, अपने साथ हरियाणा पुलिस को भी ले डूबी।


तीनों मौकों पर मनोहर लाल खट्टर के अक्षम नेतृत्व ने एक सामाजिक उभार का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की और हर बार यह प्रयास बुरी तरह विफल हुआ। यह एक आम जानकारी है कि पश्चिमोत्तर भारत, जिसमें स्वतंत्रता पूर्व का पंजाब, सिंध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश शामिल हैं, ऐसे धर्मगुरुओं और डेरों के केंद्र रहे हैं, जहां बड़े पैमाने पर अंधश्रद्धा और अशिक्षा का लाभ उठाकर बाबाओं ने खास तौर से पिछड़े और दलित समाजों के विशाल तबके को अपनी तरफ आकर्षित किया। पहले ये डेरे बड़ी जमीनों के मालिक हुआ करते थे, आज वे मल्टी नेशनल की तर्ज पर व्यापारिक साम्राज्य खड़े कर रहे हैं। यौन शोषण जरूर दोनों मे समान तत्व है। अधिकतर डेरों मे महिला साध्वियों की एक लंबी-चौड़ी फौज होती है और कई बार तो किसी बाबा का रुतबा उनकी संख्या से निर्धारित होता है। हरियाणा के दोनों बाबा-रामपाल और राम रहीम अपने धार्मिक-आध्यात्मिक ज्ञान से अधिक अपने कपड़े-लत्ते और चेलियों की वजह से चर्चा में रहे हैं। हाल के दिनों मे आसाराम बापू ने भी इस क्षेत्र में काफी नाम कमाया है।

   

आजादी के बाद पंजाब और  इसके विभाजन के बाद हरियाणा में भी डेरों का राजनीतिक इस्तेमाल हुआ है। लगभग सभी राजनीतिक दल डेरा प्रमुखों के चरणों में शीश नवाकर अपने पक्ष में  मतदान कराने का निवेदन करते रहे हैं। बाबा राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद अखबारों में सुर्खियों के साथ वर्तमान सत्तारूढ़ दल भाजपा के नेताओं द्वारा चुनावों के पहले और बाद में डेरा सच्चा सौदा में हाजिरी लगाने की खबरंे प्रमुखता से छप रही हैं, पर यदि आप थोड़ा-सा और पीछे खंगालें, तो ऐसे ही प्रयास कांग्रेस और चौटाला परिवार द्वारा भी किए गए मिल जाएंगे। आजाद भारत में पहली बार भाजपा द्वारा अपने बल पर हरियाणा मे सरकार बनाने के पीछे रामपाल और गुरमीत राम रहीम जैसे बाबाओं का आशीर्वाद भी शामिल था।


उपरोक्त तथ्यों को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि बिना इनके हरियाणा पुलिस की इस अक्षम्य विफलता को समझना मुश्किल होगा। उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी, कि सरकार ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए डेरा सच्चा सौदा के सामने समर्पण कर दिया, किसी शून्य से नहीं उपजी थी। सरकार का यही समर्पण पुलिस की उस अक्षमता के लिए जिम्मेदार है, जिसकी वजह से 25 अगस्त को पंचकूला समेत कई इलाके जल उठे।


लोकतंत्र  में स्वाभाविक रूप से नीति निर्धारण का काम जनता के चुने हुए प्रतिनिधि करते हैं, लेकिन पेशेवर मामलों मे राजनीतिक हस्तक्षेप के क्या नतीजे निकलते हैं, इसे हम डेरा सच्चा सौदा मामले में स्पष्ट देख सकते हैं। सबको पता था कि बाबा के अंध अनुयायी बड़ी तादाद मंे इकट्ठा हो रहे हैं और फैसला खिलाफ होते ही सड़कों पर उनका गुस्सा फूट पड़ेगा। इस सिलसिले मे आईबी की रिपोर्टें तो थी हीं, खुद पंजाब के पुलिस महानिदेशक ने अपने मातहतों को पत्र लिखकर इस बारे में  सतर्क किया था। कोई भी पेशेवर पुलिस नेतृत्व ऐसे मौकों पर लोगों को इकट्ठा होने से रोकता। उन्हें रोकने मे कम बल प्रयोग करना पड़ता और उस पैमाने पर जन-धन की क्षति नहीं होती, जो एक बार बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर पड़ने और अनियंत्रित हो जाने के बाद उन्हें नियंत्रित करने के प्रयास के दौरान हुई। पुलिस ने इस भीड़ को रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया ? इसका उत्तर बड़ा स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व ऐसा नहीं चाहता था। इसके लिए सरकार से किसी लिखित आदेश की जरूरत नहीं है, देह भाषा ही पर्याप्त होती है और मैं अपने अनुभव से  इतना कह सकता हूं कि भारत की नौकरशाही और पुलिस राजनेताओं की देह भाषा पढ़ने में बहुत माहिर हैं। 1984 के सिख विरोधी दंगे, 1992 का बाबरी ध्वंस या हरियाणा की ऊपर उल्लिखित तीनों घटनाएं इसी देह भाषा को पढ़कर की गई पुलिस कार्रवाई की उपज हैं।


डेरा राम रहीम के मामले मे उच्च न्यायालय ने भी आदेश दिए कि पुलिस को कितना बल प्रयोग करना चाहिए और सेना का कैसे इस्तेमाल होना चाहिए। इन सबके लिए सीआरपीसी और पुलिस ऐक्ट मे स्पष्ट प्रावधान हैं। जरूरत सिर्फ एक पेशेवर पुलिस बल द्वारा उनके पेशेवर इस्तेमाल की थी। दुर्भाग्य से हरियाणा पुलिस के पास यही पेशेवर दृष्टिकोण नहीं था। पहले राजनीतिक नेतृत्व की देह भाषा पढ़कर उन्होंने उपद्रवियों के आगे समर्पण किया और फिर न्यायालय की टिप्पणियों से घबड़ाकर आवश्यकता से कहीं ज्यादा बल इस्तेमाल कर तीस से अधिक लोगों को मार दिया। जब तक हम अपने पुलिस बलों को पेशेवर नहीं बनाएंगे, ऐसी चूकें होती रहेंगी।


पुलिस राज्य की ऐसी संस्था है, जिससे नागरिकों का सबसे अधिक वास्ता पड़ता है। 1860 के दौरान बने कानूनों के आधार पर गठित इस संस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। यदि अंग्रेजों के समय पुलिस जन-विरोधी और कानून-कायदों को ठेंगे पर रखने वाली थी, तो वह तत्कालीन शासकों की जरूरत थी। पर क्या अब समय नहीं आ गया है कि उसमंे आमूलचूल परिवर्तन किया जाए? क्या उसे जनता का मित्र, कानून-कायदे की परवाह करने वाला और एक पेशेवर संगठन नहीं बनाया जाना चाहिए? मुझे लगता है कि हमारी सरकारों की भी पुलिस सुधारों में बहुत दिलचस्पी नहीं है। वे भी देह भाषा पढ़ सकने वाली पुलिस चाहते हैं।
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-पूर्व आईपीएस अधिकारी और साहित्यकार                
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