मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इन्हीं सामाजिक प्राणियों में से कई बंदे पुलिस में भर्ती हो जाते हैं। उनके पास असामाजिक लोगों से निपटने की जिम्मेदारी होती है। इसमें रिस्क फैक्टर ज्यादा होता है। बंदे अपने काम में इतने 'इनवॉल्व' हो जाते हैं कि कई बार सामाजिक और असामाजिक का फर्क मिट जाता है।
पुलिस मोहल्ले के लफड़े से लेकर घर के झगड़े तक सुलझाने में उस्ताद होती है। कई बार भले लोग पुलिस से मानवीय बर्ताव की अपेक्षा करने लगते हैं, लेकिन वे नादान यह नहीं समझते कि मानवीय गुणों की अनुपस्थिति ही पुलिस को पुलिस बनाती है। पुलिस प्रांत और क्षेत्र के बंधनों से ऊपर होती है। अर्थात वह दिल्ली की पुलिस हो या उत्तर प्रदेश की; उसका चाल, चरित्र और चेहरा समान होता है।
पुलिस का मूल मंत्र होता है, भय पैदा करना। लेकिन प्राय: देखा यह गया है कि पुलिस से अपराधी कम, आम जनता ज्यादा डरती है। पुलिस से पब्लिक में डर पैदा न हो, तो पुलिस के पुलिस होने पर शक हो सकता है। अपराधियों के बजाय पब्लिक पर पुलिस के डर का यह शिफ्टीकरण कब और कैसे हुआ, इसका कोई ज्ञात इतिहास नहीं मिलता। अपराधियों का अपराध आम तौर पर पकड़ में आ जाता है, लेकिन पुलिस कई बार अपने अपराध को ड्यूटी का हिस्सा जैसा बना लेती है। इससे समाज में उसके भय का विस्तार होता रहता है।
एक लोकोक्ति अक्सर सुनी जाती है कि पुलिस किसी की नहीं होती। इस लोकोक्ति से आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि पुलिस निष्पक्ष होती है।'पुलिस किसी की नहीं होती' का मतलब यह है कि अगर आपकी गर्दन फंस गई, तो पुलिस के आपसे उगाही करने के चांसेज बढ़ जाएंगे। साथ ही जिसने आपकी गर्दन फंसाई है, पुलिस उससे भी वसूली कर डालती है। दोनों पार्टियों से वह अपने अंदाज में डील करती है और इस डील में अक्सर दोनों पक्षों को जेब ढीली करनी पड़ती है।
पुलिस एक खास किस्म के डंडे से न सिर्फ लैस होती है, बल्कि इसमें उसकी असाधारण मास्टरी होती है। उसके इस हुनर की बानगी अक्सर धरना-प्रदर्शन, जुलूसों के मौके पर देखी जा सकती है। पुलिस के डंडे के प्रताप से कई लोगों का राजनीति में करियर भी संवरा है। ऐसे कई लोग बाद में विधानसभा से लेकर संसद तक पहुंचे हैं। अत: यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकतंत्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए पुलिस का होना बेहद जरूरी है।