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आओ जहर उगलें

Mon, 28 Apr 2014 08:09 PM IST
सहीराम
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इन दिनों लग रहा है जी कि चुनाव नहीं हो रहा, बल्कि जहर उगलने की कोई देशव्यापी प्रतियोगिता चल रही है। इसमें जनता भाग नहीं ले सकती। जहर उसके हिस्से सारा का सारा आएगा जरूर। यह अलग बात है कि बेचारी जनता के पास तो जहर खाने का भी पैसा नहीं होता। फिर भी सारा जहर उसी के हिस्से आता है। इस प्रतियोगिता के भागीदार सिर्फ नेता ही होते हैं। नेता की भले कोई योग्यता न होती हो, पर जहर उगलनेवाली प्रतियोगिता का भागीदार बनने की योग्यता उसमें जरूर होनी चाहिए। सो देर कैसी? उगलिए जहर!
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इस प्रतियोगिता के चलते लगता है कि नेताओं की जीभ पर नाग विराजमान हो गए हैं। पहले आस्तीन में सांप पाले जाते थे, अब जीभ पर नाग पाले जाने लगे हैं। क्योंकि वहां वे बेहतर ढंग से फुफकार सकते हैं। आस्तीन वाले सांप तो सिर्फ डस सकते हैं, पर जिह्वा पर विराजमान होने वाले जहर भी उगल सकते हैं। पहले लोग सांपों को दूध पिलाते थे। आजकल पार्टियां उन नेताओं को दूध पिला रही होंगी, जिन्होंने अपनी जिह्वाओं पर नाग पाल रखे हैं। जब पहलवानों को पाला जाता है, तो जहर उगलने वालों को क्यों नहीं पाला जाएगा?

तो इस प्रतियोगिता में आओ। पार्टी के पट्टे के साथ, अपनी पहचान के साथ, मैदान में आओ। आओ दिखाओ कि कौन ज्यादा जहर उगल सकता है। इस चक्कर में हर तरफ जहर ही जहर है। नेता लोग वायदे तो यही कर रहे हैं कि हम दूध की नदियां बहा देंगे, पर वास्तव में वे जहर की नदियां ही बहा रहे हैं। अब तो लगता है कि बादल भी जहर ही बरसेगा।
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थोड़े दिन पहले कोई कह रहा था कि जहर की खेती की जा रही है। जवाब में कोई कह रहा था कि जहर तो वही बो रहे हैं, जो कह रहे हैं कि जहर की खेती हो रही है। कोई कह रहा था कि राजनीति ही जहर है। हर तरफ जहर लबालब है। सब पार्टियों के पास जहर उगलनेवाले नेता हैं। चुनौतियां दी जा रही हैं कि हम तुमसे कम नहीं। ऐसे में परेशान है, तो बेचारा चुनाव आयोग। जहर उगलनेवाली इस प्रतियोगिता को वह रोके, तो कैसे!
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