क्रांति करो
अब चुप मत बैठो
राजा नहीं बदलने वाला।
आग हुई
चूल्हे की ठंडी
अदहन नहीं उबलने वाला।
महंगाई के
रक्तबीज अब
दिखा रहे हैं दिन में तारे,
चुप बैठे हैं
सुविधा भोगी
जन के जनप्रतिनिधि बेचारे,
कैलेन्डर की
तिथियों से अब
मौसम नहीं बदलने वाला।
कुछ ही दिन में
कंकड़-पत्थर
मुंह के लिए निवाले होंगे,
जो बोलेगा
उसके मुंह पर
कम्पनियों के ताले होंगे,
भ्रष्टाचारी
केंचुल पहने
अजगर हमें निगलने वाला।
हर दिन
उल्का पिंड गिराते
आसमान से हम क्या पाते?
आंधी वाली
सुबहें आतीं
चक्रवात खपरैल उड़ाते,
इस सूरज से
कुछ मत मांगो
शाम हुई यह ढलने वाला।