कभी नहीं, दोबारा कभी नहीं
जगमगाती सितारों की रात में भी नहीं
न ही सूरज की पहली किरण के साथ
न ही किसी अलसाई सी दुपहरी में।
न ही खेत-खलिहानों के चारों तरफ बनी
पगडंडी के किसी छोर पर
न ही चांदनी की सफेद चादर ओढ़े
बहते झरनों के पास।
न ही मैं चाहती हूं उस जंगल के
घने पेड़ों के नीचे
उसका नाम पुकारना, जहां मैं पूरी रात बिना रूके आगे बढ़ती रही हूं।
न ही किसी गुफा में जहां
मेरे रोने की हर एक सिसकी मुझे
वापस गूंजती हुई सुनाई दे।
नहीं, उसे दोबारा देखने के लिए
जगह मायने नहीं रखती
स्वर्ग के ठहरे हुए जल में
या फिर किसी तपते बवंडर के बीच
खामोश चांद के नीचे या फिर
डर से घिरे हुए भी
उसके साथ होने के लिए
वसंत और शरद का हर मौसम
उसकी गर्दन के चारों तरफ
कसी हुई गांठ की तरह बंधा है।
अनुवाद-हिमानी दीवान