एक नवोदित कवि तुकबंदी पर अपने हाथ आजमा रहे थे- कुंडा का गुंडा, उसके हाथ में डंडा। कवि जी के उस्ताद ने स्नेह से उन्हें ऐसे देखा, जैसे बलैया ले रहे हों। पर क्योंकि वे उस्ताद थे, सो उस्तादी दिखाना भी जरूरी था। इसलिए धीर-गंभीर होकर उन्होंने कहा कि कुंडा का गुंडा तो खैर राजनीति का पुराना मुहावरा है, पर तुमने गुंडा के साथ डंडा का अच्छा इस्तेमाल किया है।
हालांकि डंडा दरोगाई के साथ जुड़ा है और अभी तक दुनिया में दरोगाई अमेरिका की ही प्रसिद्ध रही है। गुंडे के हाथ में तमंचा ही जंचता है। फिर हमारे यहां तो बेचारे दारोगाओं की हालत यह होती है कि गुंडे उन्हीं के डंडे से उन्हें पीट सकते हैं और तमंचे से गोली मार सकते हैं। खैर, तुम्हें इस तुकबंदी में कहीं यह भी जरूर लाना चाहिए कि यही है राजनीति का फंडा।
कवि महोदय गद्गद हुए। बोले-उस्ताद जी, अगर इसमें पार्टी का झंडा भी आ जाए, तो... इस बार गद्गद होने की बारी उस्ताद जी की थी, पर उन्होंने आगाही की, गुंडे को बिना झंडे के ही रहने दो। बेवजह पार्टियां शर्मसार हो जाएंगी और निर्दलीय रहते हुए गुंडे का जो रुतबा होता है, वह भी घट जाएगा।
उत्साहित कवि ने कहा- उस्ताद जी, पता नहीं हमारे कविगण राजनीति की तरफ क्यों नहीं झांकते। यहां तो तुकें बड़ी आसानी से मिल जाती हैं। अब देखिए, कांडा के तो कांड ही कांड, घूमें जैसे छुट्टा सांड। उस्ताद जी शिष्य की प्रतिभा के कायल हुए, लेकिन उस्तादी दिखाते हुए उन्होंने सुझाव दिया, इसमें उसके झक्क कुर्ते का कड़क मांड भी आ सकता है।
उत्साहित होकर कवि जी ने तुकबंदी और चर्चा दोनों को ही आगे बढ़ाया- राजनीति में तुकबंदी की इतनी सुविधा है उस्ताद जी कि चौटाला के साथ घोटाला देखो, कितनी आसानी से जुड़ जाता है। हां, यह भी थोड़ा पुराना ही मुहावरा है-उस्ताद जी ने कहा-एक जमाने में शरद जोशी जी ने कहा था- चोट सहें, चौटाला सहें।
तभी से चोट, चौटाला और घोटाला सब साथ-साथ चलते ही आ रहे हैं। कवि जी थोड़े सोच में पड़े थे-इसमें अगली तुक क्या हो सकती है? क्या तिहाड़ का ताला हो सकती है? उस्ताद जी शिष्य की प्रतिभा के फिर कायल हो गए। सो उन्होंने शिष्य का हौसला बढ़ाया- बेटा, तिहाड़ का ताला भी हो सकता है और गरीबों के हाथ से छीना गया निवाला भी। लेकिन वे इस बात पर समान रूप से सहमत थे कि राजनीति में तुकबंदी की सुविधा काफी है।