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तमिलनाडु के सियासी खेल में पीएमके

आर राजगोपालन Published by: Raman Singh Updated Mon, 25 Feb 2019 06:26 PM IST
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अन्नाद्रमुक-पीएमके

तमिलनाडु में लोकसभा के 39 सीटों के लिए अन्नाद्रमुक, भाजपा और पीएमके के बीच गठबंधन हो गया है। अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच बहुत करीबी संघर्ष है। भाजपा जहां अन्नाद्रमुक के पीछे खड़ी है, वहीं कांग्रेस द्रमुक की पीठ पर सवार है। रजनीकांत ने इस संघर्ष से खुद को अलग रखा है, जबकि कमल हासन द्रमुक का खेल खराब करेंगे। एक बार जब चुनाव प्रचार शुरू हो जाएगा, तब सिने जगत इस संघर्ष से बाहर निकल जाएगा। केवल कमल हासन ही रणक्षेत्र में बाकी बचे रह जाएंगे।



अब तक के इतिहास में यह पहली बार है, जब तमिलनाडु किसी कद्दावर नेता के बिना चुनावी रण में उतरेगा। अब न तो जयललिता हैं और न ही करुणानिधि। यही वजह है कि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी द्रमुक के लिए यह करो या मरो की स्थिति है, विशेष रूप से एम के स्टालिन के लिए। इसके बावजूद तमिलनाडु राष्ट्रीय संघवाद के लिए मॉडल राज्य के रूप में बना रहेगा, क्योंकि जो छोटी पार्टियां फिलहाल चुनावी अभियान में हैं, वे केवल जिला एवं राज्य के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती हैं।


आगामी लोकसभा चुनाव में पीएमके (पताली मक्कल काटची) सर्वाधिक फायदे में रहने वाली पार्टी के रूप में उभरी है। इसका वोट बैंक बरकरार है। इसलिए पीएमके जैसी छोटी पार्टी द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी प्रमुख पार्टियों से सौदेबाजी करती है। इसने इन दोनों प्रमुख पार्टियों से बात की, लेकिन अंततः मुख्यमंत्री पलानीस्वामी के पक्ष में जाना स्वीकार किया। पीएमके अन्नाद्रमुक के करीब हो रही है, वास्तव में इसका फायदा पलानीस्वामी सरकार को होगा, जो लोकसभा चुनाव के बाद भी सत्ता में बनी रहेगी। तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति अजीबोगरीब है। लोकसभा चुनाव के साथ राज्य में 21 विधानसभा सीटों के लिए भी चुनाव होंगे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से 10 विधानसभा सीटों पर पीएमके की मजबूत पकड़ है, क्योंकि ये क्षेत्र उसके गढ़ में हैं। अन्नाद्रमुक के लिए यही मुख्य आकर्षण है। अगर विपक्षी पार्टी द्रमुक विधानसभा की पांच से आठ सीटें जीत भी जाती हैं, तो भी लोकसभा चुनाव के बाद पलानीस्वामी की सरकार बची रहेगी। अन्नाद्रमुक को 21 विधानसभा सीटों में से 15 सीटें जीतने का भरोसा है। यही वह मुख्य आकर्षण है, जिसके चलते अन्नाद्रमुक ने पीएमके को लुभाया।

 

इतने महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा और कांग्रेस कहां फिट बैठती हैं? भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन किया है, जो हिंदुओं की भावनाओं को भी प्रभावित करता है। जयललिता के जीवन काल में ही पार्टी ने अपने घोषणापत्र में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का खुलकर समर्थन किया था। भाजपा को और क्या चाहिए! क्या यह उसके लिए मधुर नहीं है? अगर भाजपा तमिलनाडु में लोकसभा की दो सीट भी जीतती है, तो यह नरेंद्र मोदी के लिए बोनस ही होगा। स्पष्ट रूप से कहें, तो अमित शाह और नरेंद्र मोदी, जो शिवसेना-भाजपा समझौते के बाद ट्वीट करने के लिए उत्सुक थे, पीयूष गोयल द्वारा भाजपा के साथ अन्नाद्रमुक के गठजोड़ के बाद अपना उत्साह व्यक्त करने में विफल रहे। एनडीए की ओर से अन्नाद्रमुक के स्वागत से संबंधित कोई ट्वीट नहीं किया गया। आखिर भाजपा की ओर से इस तरह की चुप्पी क्यों? कांग्रेस के लिए भी इसी तरह की कठिन स्थिति है। लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान लगभग सभी राजनीतिक दल 2009 में श्रीलंका के उत्तर पूर्वी प्रांत में हुए तमिल नरसंहार पर ध्यान केंद्रित करना सुनिश्चित करेंगे और इसके लिए कांग्रेस और यूपीए शासन पर दोष मढ़ेंगे। श्रीलंका के तमिल मुद्दे पर करुणानिधि यूपीए से बाहर हो गए थे। थोड़े दिनों पहले तक राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने वाली द्रमुक ने कांग्रेस के पक्ष में अपने सुर मद्धिम कर लिए हैं।


सबसे अच्छे ढंग से प्रशासित तमिलनाडु फिलहाल दिग्गज नेताओं के अभाव में नेतृत्व के संकट से गुजर रहा है। क्या जयललिता और करुणानिधि की जगह छोटी पार्टियां हथिया लेंगी या नरेंद्र मोदी मानते हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद वहां भाजपा या कांग्रेस के लिए जगह बनेगी? दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीय पार्टियां कद्दावर नेताओं की जगह ले लेंगी।

 

डीडीएमके के नेता विजयकांत अस्वस्थ हैं। टीटीवी दिनाकरन की नई राजनीतिक पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कझगम (एएमएमके) इस संघर्ष में बच पाएगी या खत्म हो जाएगी? अन्य राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियों को भी बातचीत में पीएमके द्वारा निर्धारित भूमिका का अनुकरण करना चाहिए, क्योंकि तमिलनाडु में सात से आठ फीसदी वोट शेयर के साथ पीएमके राष्ट्रीय पार्टियों से ऊपर आ गई है। पीएमके का वोट बैंक वास्तविक है।


तमिलनाडु की वास्तविक जमीनी स्थिति यह है कि अन्नाद्रमुक या द्रमुक किसी को भी एकतरफा वोट नहीं मिलेगा। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों को कुछ सीटें मिलने के कारण तमिलनाडु में खंडित जनादेश की आशंका है। 40 लोकसभा सीटों में से द्रमुक को दोहरे अंकों में सफलता मिलेगी। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक समेत अन्य सभी पार्टियां दस से कम सीटें ही हासिल कर पाएंगी। कहा जाता है कि पलानीस्वामी की अन्नाद्रमुक आठ सीटों पर सिमट जाएगी। जबकि द्रमुक के समर्थन से कांग्रेस कम से कम चार सीटें जीत पाएगी। पीएमके तीन और दो प्रमुख दलों के साथ गठबंधन करने के बाद भाजपा को दो सीटें मिलने के अनुमान हैं। चाहे आप जैसे भी देखें, या जो भी कहें, असली फायदे में पीएमके है। और कम से कम आगामी मई तक (जब कि नतीजे नहीं आते) यह कहने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी कि द्रमुक हार रही है।
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राष्ट्रीय परिदृश्य पर इसका क्या असर पड़ेगा? एक बार जब छोटी पार्टियां दक्षिणी राज्यों, खासकर तमिलनाडु में जीत जाती हैं, तो वे राष्ट्रीय राजनीति में लोकसभा चुनाव के नतीजे के बाद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। उनका तरीका और उनकी सनक नई दिल्ली में राज करेगी। 

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