बुधवार को पूरे दिन दिल्ली में यही अटकलें लगाई जा रही थीं कि प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम अपने छठे संबोधन में क्या कहेंगे। क्या वह कोर कमांडरों की वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास बैठक को लेकर चीन के बारे में कुछ कहेंगे अथवा वह कुछ ऐसी बातें करेंगे, जिससे लोगों का ध्यान चीन पर से हट जाए, क्योंकि कई लोग चीनी सेना द्वारा भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ को लेकर सरकार पर लगातार हमले कर रहे हैं।
हम जानते हैं कि लोगों को हैरान करना प्रधानमंत्री की प्रवृत्ति है, जैसा कि उन्होंने नवंबर, 2016 में नोटबंदी करके किया था। और तब भी, जब उन्होंने विगत 24 मार्च को मुख्यमंत्रियों को तैयारी का मौका दिए बिना लॉकडाउन की घोषणा की थी। नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम छठा संबोधन मात्र 17 मिनट का था, जो प्रधानमंत्री के लिए असामान्य बात है।
उन्होंने देश के 80 करोड़ लोगों के लिए प्रति महीने प्रति परिवार पांच किलो गेहूं या चावल और एक किलो चना देने की योजना का विस्तार करते हुए उसे नवंबर के अंत तक जारी रखने की घोषणा की, जो महत्वपूर्ण है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहली बार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत इसकी घोषणा की थी और इसे 30 जून को समाप्त होना था।
प्रधानमंत्री ने जो घोषणा की, वह एक अधिसूचना जारी करके भी बताया जा सकता था, लेकिन तब वैसा प्रभाव नहीं होता। प्रधानमंत्री के ऐसा करने से यह संदेश गया कि वह अति निर्धन लोगों की जरूरतों का ख्याल रखते हैं और उनके त्योहारों के बारे में भी सोचते हैं। प्रधानमंत्री ने अगले पांच महीनों में आने वाले सभी त्योहारों का जिक्र किया। इस घोषणा का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने की है, बल्कि इसके समय को लेकर भी है।
आजीविका के भारी नुकसान को देखते हुए, संकीर्ण अनुमान के मुताबिक 13 करोड़ लोग इससे प्रभावित हुए हैं, कई लोग यह मांग करते रहे हैं कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में जो अनाज पड़ा है, वह गरीब लोगों को उपलब्ध कराया जाए, ताकि कोई भी भूखा न रहे। हालांकि प्रधानमंत्री ने अपने किसी हालिया भाषण में कहा था- अनलॉक, अनलॉक, अनलॉक, लेकिन अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार एक दीर्घकालीन काम है।
लाखों मजदूर अपने गांव लौट गए हैं और उनमें से कुछ ही वापस लौट रहे हैं। मनरेगा का विस्तार किए जाने के बावजूद घर पर उनके पास कोई रोजगार नहीं है। अपने घर लौटने वाले श्रमिकों में से कुछ अर्ध-कुशल और कुशल श्रमिक भी हैं और वे तब तक अकुशल श्रमिकों वाला मनरेगा का काम करना पसंद नहीं करेंगे, जब तक कि कठोर परिस्थितियां न हों। मानवीय पहलुओं के अलावा यह एक टाइम बम की तरह है, जिसे डिफ्यूज किया जाना है। आज कोई भी सरकार के इस कदम का विरोध करने में असमर्थ है।
सोनिया गांधी ने तो प्रधानमंत्री को इसके लिए पत्र भी लिखा था। इस योजना के तहत देश में 90,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। प्रधानमंत्री ने मध्यवर्ग को भी एक अनकहा संदेश दे दिया कि वे अपनी कमर कसने के लिए तैयार रहें और अगर पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ते हैं, तो ज्यादा शोर न मचाएं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ कांग्रेस आंदोलन कर रही है।
ईमानदारी से कर चुकाने के लिए मध्यवर्ग की प्रशंसा करना भी प्रधानमंत्री की रणनीति का हिस्सा था। आज अमेरिका न केवल स्वास्थ्य संकट से, बल्कि सुस्त अर्थव्यवस्था और सामाजिक अशांति से भी जूझ रहा है। भारत खाद्यान्न को लेकर दंगा या सामाजिक अशांति को बर्दाश्त नहीं कर सकता। जरूरतमंदों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसके अभाव में अन्य सामाजिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं, जैसे बाल विवाह, तस्करी और बाल श्रम में वृद्धि या लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाना।
यह मानना भोलापन ही होगा कि यह घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री के मन में बिहार चुनाव का ख्याल नहीं रहा होगा। योजना का विस्तार अक्तूबर-नवंबर में होने वाले बिहार चुनाव को कवर करता है। उत्तर भारत के एक और राज्य को अपने अधीन करना भाजपा के लिए इनाम सरीखा होगा, जिस पर उसकी नजर है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ‘एक देश-एक राशन कार्ड’ की घोषणा की, जो देश में हर जगह लागू होगा। यह भी संकटग्रस्त प्रवासी श्रमिकों के लिए एक संदेश है कि भाजपा नीत केंद्र सरकार उनकी जरूरतों को नहीं भूली है। आखिरकार, बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक बिहार वापस चले गए। और धारणाओं को प्रबंधित करने में प्रधानमंत्री माहिर हैं।
और एक बात, प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन खुलने के बाद लोगों द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हर कोई मास्क का इस्तेमाल और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कर रहा है। उन्होंने जो कहा, वह बिल्कुल सच है और इसके लिए कुछ हद तक सरकार भी जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री ने जब पहले लॉकडाउन की घोषणा की थी, पूरे देश ने सहयोग किया था।
उस समय भारत ने जिस अनुशासन का प्रदर्शन किया था, उसकी वैश्विक प्रशंसा हुई थी। आज बहुत से लोग कानून को गंभीरता से नहीं लेते हैं। संक्षेप में आज लॉकडाउन खुलने के बाद ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। क्या मंदिर, मॉल को खोलना और शादियों में 50 लोगों को भाग लेने की अनुमति देना वाकई जरूरी था? ये उत्पादन गतिविधियों से नहीं जुड़े हैं, इसलिए थोड़ा इंतजार किया जा सकता था।
यहां तक कि शादी में 50 लोगों की भीड़ जमा करना जोखिम भरा है। बिहार में एक शादी में न केवल सौ से ज्यादा लोग संक्रमित हो गए, बल्कि दुल्हे की भी मौत हो गई। प्रधानमंत्री ने सभी को संकल्प दिलाया कि अगर कोई नियमों को नहीं माने, तो उन्हें रोका-टोका जाना चाहिए।
क्या इससे पुलिस को डंडे का और अधिक सहारा लेने के लिए बढ़ावा मिल सकता है? आखिरकार कानून का अनुपालन सुनिश्चित करने का यही तो पुलिस का तरीका है। जिस तरह से पुलिस ने लॉकडाउन के शुरू में प्रवासी श्रमिकों को अपने घर जाने से रोकने के लिए डंडे का इस्तेमाल किया था, क्या भरोसा है कि वैसा अब फिर नहीं होगा।
बेशक ऐसे भी उदाहरण हैं कि पुलिस ने लोगों की मदद करने और कानून पालन करने की खातिर लोगों को मनाने के लिए इससे अलग तरीका भी अपनाया। इसलिए एक बार फिर से पुलिस सुधार की मांग उठ रही है। लेकिन उससे पहले देश की पुलिस को यह संदेश जाना चाहिए (और यह राज्य सरकारों द्वारा ही होगा) कि वे बर्बर तरीका न अपनाएं।