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सियासत : एशियाई भू-राजनीति में नया अध्याय, नई क्षेत्रीय व्यवस्था में भारत-जापान की कदमताल

केएस तोमर
Updated Mon, 01 Sep 2025 04:39 AM IST

सार

चीन से पहले प्रधानमंत्री मोदी की टोक्यो यात्रा ने भारत और जापान के बीच एक रणनीतिक तालमेल का सूत्रपात किया है। यह साझेदारी एशिया में एक नए अध्याय की शुरुआत है, जहां भारत और जापान न केवल साझेदार के रूप में, बल्कि एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था के वास्तुकार के रूप में एकसाथ चलेंगे।
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


रक्षा और सुरक्षा: दोनों पक्षों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। संयुक्त नौसैनिक अभ्यास अब साइबर सुरक्षा और युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक विस्तारित होंगे। जापान की उन्नत समुद्री निगरानी क्षमताएं हिंद महासागर में भारत की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति का पूरक होंगी।


आर्थिक लचीलापन: अगले पांच वर्षों में 35 अरब डॉलर के जापानी निवेश के एक महत्वपूर्ण पैकेज की घोषणा की गई, जिसका लक्ष्य भारत की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं, सेमीकंडक्टर उत्पादन केंद्रों और हरित हाइड्रोजन पहलों पर केंद्रित है। यह 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के अनुरूप है और जापानी कंपनियों को एक विशाल और बढ़ते बाजार तक पहुंच प्रदान करता है।


लोगों के बीच आदान-प्रदान: दोनों नेताओं ने छात्र और शोध छात्रवृत्तियों का विस्तार करने, जापान में भारतीय पेशेवरों के लिए कार्य वीजा को सुव्यवस्थित करने और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इससे सामाजिक जुड़ाव मजबूत होगा, जो आर्थिक और सुरक्षा ढांचे का पूरक होगा।


भारत को लाभ: इस यात्रा से भारत को कई लाभ हुए हैं। पहला, जापान के समर्थन को मजबूत करके भारत ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता (क्वाड) में अपनी स्थिति मजबूत की है। स्टील्थ पनडुब्बी तकनीक और ड्रोन प्रणालियों सहित रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ाने की जापान की इच्छा, भारत की सैन्य तैयारियों को मजबूत करती है। दूसरा, जापान सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और हरित प्रौद्योगिकी में वैश्विक अग्रणी बना हुआ है। जापान के साथ सहयोग सुनिश्चित करता है कि भारत भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पीछे न रहे। तीसरा, भारतीय निर्यात पर ट्रंप के भारी टैरिफ लगाए जाने के दौर में जापान भारत को एक वैकल्पिक स्थिर बाजार प्रदान करता है। दोनों पक्ष भारत के निर्यातकों को अमेरिकी व्यापार झटकों से बचाने के लिए तरजीही व्यापार सुविधा पर बातचीत करने पर सहमत हुए। चौथा, जापान ने दीर्घकालिक एलएनजी आपूर्ति अनुबंधों और हाइड्रोजन ईंधन में संयुक्त उद्यमों के लिए प्रतिबद्धता जताई है, जिससे अस्थिर पश्चिम एशियाई आपूर्ति पर भारत की निर्भरता कम हो जाएगी। पांचवां, मोदी की यात्रा ने एशिया के शक्ति संतुलन में भारत को एक अपरिहार्य भागीदार के रूप में स्थापित किया। ऐसे समय में जब चीन का दबदबा है, जापान के साथ खड़े होने का प्रभाव एक स्थिर शक्ति के रूप में भारत की विश्वसनीयता को बढ़ाता है।


अमेरिका पर असर: क्षेत्रीय व्यापार और आपूर्ति शृंखला एकीकरण के लिए भारत और जापान की नई प्रतिबद्धता अमेरिका के प्रभाव को कम करती है। ट्रंप के टैरिफ ने अनजाने में भारत और जापान को करीब ला दिया है, जिससे एक ऐसा क्षेत्रीय आर्थिक ढांचा तैयार हुआ है, जो अमेरिकी प्रभुत्व को दरकिनार कर देता है। भारत के साथ गहन रक्षा सहयोग की ओर इशिबा का झुकाव टोक्यो की सुरक्षा संबंधी नीतियों में विविधता लाने का संकेत है, जिसका मतलब है कि हिंद-प्रशांत गठबंधनों को आकार देने में अमेरिकी प्रभाव कम होगा। भारत-जापान सेमीकंडक्टर साझेदारी, अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के विकल्प के रूप में उभर सकती है। यह एशियाई तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं को अमेरिकी नियंत्रण में रखने के ट्रंप के प्रयासों को चुनौती दे सकती है। साथ ही यह अमेरिका के लेन-देन संबंधी दृष्टिकोण की तुलना में भारत की बढ़ती कूटनीतिक चपलता को रेखांकित करती है। नतीजतन एशिया के उभरते शक्ति संतुलन में ट्रंप की केंद्रीयता कम होगी तथा सौदेबाजी की शक्ति भी घटेगी।


जापान को फायदा: भारत को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में पाकर बीजिंग की जबर्दस्ती की रणनीति के समक्ष अब जापान के अलग-थलग पड़ने का खतरा कम हो गया है। पहले से ही चीनी आपूर्ति शृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता से चिंतित जापानी कॉरपोरेशन भारत को एक सुरक्षित विकल्प के रूप में देखते हैं। भारत का 1.4 अरब लोगों का विशाल बाजार बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय प्रौद्योगिकी और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अवसर प्रदान करता है। घरेलू राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे शिगेरु इशिबा, भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के जरिये अपनी विदेश नीति की सफलता को दर्शा सकते हैं। जापान की आबादी वृद्ध होती जा रही है। भारत के युवा कार्यबल की मेहनत और कौशल गतिशीलता जापान के मानव संसाधन अंतराल को भर देगी, जबकि भारतीय पेशेवरों को उच्च स्तरीय रोजगार के अवसर मिलेंगे।
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व्यापक एशिया पर प्रभाव: भारत-जापान शिखर सम्मेलन की गूंज पूरे एशिया में कई मायनों में सुनाई देगी। छोटे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश, जो अक्सर अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में फंसे रहते हैं, भारत-जापान धुरी को तीसरी स्थिर शक्ति के रूप में स्वीकार करेंगे। यह उन्हें वाशिंगटन या बीजिंग के साथ विशेष रूप से जुड़े बिना कूटनीतिक रूप से आगे बढ़ने की गुंजाइश देता है। यह साझेदारी दक्षिण एशिया और अफ्रीका में कनेक्टिविटी को नया रूप दे सकती है, तथा चीन के बीआरआई को चुनौती दे सकती है। भारतीय और जापानी सेनाओं के बीच तालमेल चीन की आक्रामकता को रोक सकता है, जिससे एशिया के सामुद्रिक क्षेत्र में स्थिरता बढ़ सकती है।


प्रधानमंत्री मोदी की टोक्यो यात्रा ने भारत और जापान के बीच एक रणनीतिक तालमेल का सूत्रपात किया है। यह साझेदारी एशिया में एक नए अध्याय की शुरुआत है, जहां भारत और जापान न केवल साझेदार के रूप में, बल्कि एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था के वास्तुकार के रूप में एकसाथ चलेंगे। edit@amarujala.com

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