नवंबर, 2019 में भारत को एक बहुत बड़े मुक्त व्यापार समझौते- रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) पर दस्तखत करने का कठिन फैसला लेना था, जिसमें अपने बाजार को चीन, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे तमाम देशों के लिए खोलना था। भविष्य के संभावित नीति-नियंता (उनमें से कुछ अब कृषि सुधार कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं) कृषि उपज (डेयरी उत्पाद सहित) के लिए भारत के बाजार खोल देने की मांग कर रहे थे, जो न्यूजीलैंड, मलयेशिया और जापान जैसे तमाम देशों से आयात की जाती।
यह फैसला भारतीय किसानों को दरिद्र बना देने वाला होता। भारत के हित को सबसे ऊपर रखते हुए प्रधानमंत्री ने आरसीईपी वार्ता से बाहर निकलने का कठोर फैसला लिया। यह सही समय पर लिया गया एक समझदारी भरा फैसला था- अब, जबकि दूसरे देश चीन पर अपनी निर्भरता पर पुनर्विचार कर रहे हैं, भारत काफी आगे निकल चुका है, और
मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक क्षेत्र में इसकी कोशिशें रंग ला रही हैं। हम आखिरकार मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में चीन का विकल्प बनने के करीब पहुंच
चुके हैं। यह प्रकरण एक सबक है कि भारत और इसके मजबूत नेतृत्व को अपनी नीतियां लागू करने के लिए किस तरह के मुश्किल माहौल का सामना करना पड़ता है, चाहे इससे कितने भी अच्छे विकास का लाभ मिलने वाले हों। जैसा कि बीते कुछ हफ्तों में रुझान दिखा, मजबूत नेतृत्व द्वारा भारत के हितों को आगे बढ़ाने के तर्कसंगत सुधारों को विदेशों से भी आलोचना का सामना करना पड़ा।
इसी तरह अक्तूबर, 2018 में भारत को एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की पांच यूनिट खरीदने के लिए रूस के साथ पांच अरब डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महत्वपूर्ण फैसले का सामना करना पड़ा– तत्कालीन अमेरिकी सरकार ने भारत को चेतावनी दी थी कि यह समझौता हुआ, तो अमेरिका के शत्रुओं का सामना करने वाले कानून के तहत उस पर पाबंदियां लगा दी जाएंगी। यह कोरी धमकी नहीं थी– 2017 में तुर्की ने रूसी मिसाइलों के लिए 2.5 अरब डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे; नतीजे में उसे एफ-35 ज्वाइंट स्ट्राइक फाइटर प्रोग्राम से निलंबित कर दिया गया, और एयरक्राफ्ट खरीदने पर पाबंदी लगा दी गई थी। इस बार भी, भारत की रक्षा के बारे में प्रधानमंत्री की दुविधा-विहीन सोच की साफ झलक दिखी– भारत इस समझौते पर आगे बढ़ा।
चीन के साथ सीमा पर हालिया अशांति को देखते हुए राफेल समझौते पर आगे बढ़ना, सही समय पर की गई खरीद साबित हुई, और यह हमें हमारे पारंपरिक शक्ति-संतुलन को कायम रखने में मदद करेगा। 2019 में, फिर इसी जज्बे के साथ प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मौजूदा सरकार ने, पृथ्वी डिलीवरी व्हीकल मार्क- II इंटरसेप्टर की मदद से सफलतापूर्वक एंटी-सैटेलाइट टेस्ट (एएसएटी) में एक माइक्रोसेट-आर सैटेलाइट को नष्ट कर भारत की रक्षा क्षमता का प्रदर्शन किया। भारत अब सैन्य अर्थों में एक मान्य स्पेस पावर है। हाल ही में, भारत कोविड-19 महामारी में अपनी खुद की चुनौतियों के बावजूद, उन चंद देशों में से एक है, जिन्होंने दूसरों को मदद की पेशकश की— चाहे वह दवाएं हों, पीपीई किट हो या बेहद जरूरी वैक्सीन।
भारत तीसरी दुनिया के देशों के लिए वैक्सीन की पेशकश करने वाला पहला देश है- यहां तक कि पाकिस्तान भी हमसे अप्रत्यक्ष रूप से वैक्सीन हासिल कर रहा है। यह सब काफी हद तक पिछले साल की शुरुआत में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उत्पादन बढ़ाने के लिए हमारे घरेलू वैक्सीन निर्माताओं को प्रोत्साहन और समर्थन देने की योजना का नतीजा है। इसके नतीजे वैश्विक रुझानों के उलट होने की संभावना है– भूटान जैसे देश द्वारा, कनाडा जैसे विकसित देश (जिसने अपनी आबादी के छह गुना को कवर करने के लिए वैक्सीन का ऑर्डर दिया है) की तुलना में बहुत पहले अपनी पूरी आबादी का टीकाकरण कर लेने की उम्मीद है।
यह दृष्टि आंतरिक सुरक्षा के मामलों में भी दिखाई होती है। देश के अंदर से और दूसरे देशों से कई लोगों ने अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने की आलोचना की, लेकिन यह कदम केंद्रीय गृहमंत्री की समर्थ दृष्टि के साथ आतंकवादियों का खात्मा (वर्ष 2020 में 200 से अधिक) करने में बड़ी सफलता ले आया। बीते कुछ वर्षों में इस्लामिक आतंकवाद का भारत से सफाया हो गया है, 2016 के बाद से नागरिक क्षेत्रों (कश्मीर को छोड़कर) में कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ है। इस बीच, गृह मंत्रालय की पहल पर एनआईए ने भारत में सक्रिय इस्लामिक स्टेट की कई इकाइयों का पर्दाफाश किया- कर्नाटक और केरल के जंगलों में बेस बनाने की योजना को नाकाम करते हुए दिसंबर 2019 में करीब 17 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया।
नक्सलवाद एक ऐसा शब्द था, जो 2016 से पहले नीति निर्माताओं के लिए हमेशा सिरदर्द बनता था, अब नक्सल गतिविधियों में कमी आने के साथ भारत के अधिकांश हिस्सों से वह गायब हो चुका है। आंध्र प्रदेश जो पहले नक्सलवाद का हॉटस्पॉट था, वहां केंद्र द्वारा अतिरिक्त संसाधन दिए जाने के बाद स्थानीय पुलिस कार्रवाई और बेहतर नेतृत्व से नक्सली गतिविधियों में महत्वपूर्ण कमी देखी गई। 2014 के बाद से झारखंड में आतंकवाद विरोधी अभियानों की एक शृंखला चलाई गई, जिससे माओवादी हिंसा में कमी आई। नक्सली हिंसा करीब 30 जिलों (मुख्यतः प्रभावित राज्यों के सीमावर्ती इलाके में एक त्रिकोणीय क्षेत्र) तक सिमट गई है। यहां तक कि पूर्वोत्तर में भी उग्रवाद में भारी गिरावट आई है और पीएमओ और गृह मंत्रालय के मार्गदर्शन में बड़ी संख्या में विकास कार्यक्रमों की पहल ने भारत के साथ क्षेत्र के बेहतर एकीकरण को मुमकिन बनाया है।
मजबूत नेतृत्व जो भारत के हितों को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता है, स्वाभाविक रूप से उसकी आलोचना भी होगी। अच्छे नेता सुसंगत आलोचनाओं का स्वागत करते हैं, जबकि अर्थहीन तबाही के भविष्यवक्ताओं को अनदेखा करते हैं। हमारे पास ऐसा नेतृत्व है, जो भारतवर्ष के हित को सबसे आगे रखता है।