प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और इसके नागरिकों को 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था को पचास खरब डॉलर तक पहुंचाने का एक ऊंचा लक्ष्य दिया है। हर आगे बढ़ते देश के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य जरूरी होता है, सो हर कोई इस लक्ष्य तक पहुंचने में योगदान करना चाहता है। इस दृष्टिकोण पर आगे बात करने से पहले हम मौजूदा हालात पर गौर करते हैं। वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आकार 190 लाख करोड़ रुपये या 27 खरब डॉलर (एक डॉलर 70 रुपये के मूल्य के आधार पर) था। यानी अगले छह वर्ष तक आठ फीसदी की विकास दर से, यानी 3.5 फीसदी मुद्रास्फीति के साथ 11.5 फीसदी की सामान्य विकास दर से 27 खरब डॉलर से पचास खरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य अव्यवहारिक नहीं है।
रुपये के अवमूल्यन जैसी चिंता को किनारे रखते हुए असल मुद्दा यह है कि क्या हम अगले छह वर्ष तक आठ फीसदी की विकास दर हासिल कर सकते हैं? 1991 में जब देश की अर्थव्यवस्था को मुक्त किया गया था, तब जीडीपी 275 अरब डॉलर थी; 27 खरब डॉलर पहुंचने तक देखें तो डॉलर के संदर्भ में औसतन 8.5 फीसदी की विकास दर की जरूरत थी। 8.5 फीसदी की विकास दर अवधारणात्मक है और इस बात का प्रमाण है कि भारत के पास यह क्षमता है। भारत के 28 वर्ष के मजबूत इतिहास और विकास की क्षमता को देखते हुए भारत के पचास खरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की संभावना 80 फीसदी से भी अधिक है। आठ फीसदी की विकास दर हासिल करने और उसे कायम रखने के लिए अगले छह वर्षों तक अनेक नीतिगत पहलों की जरूरत होगीः-