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मोदी स्टेडियम में मोदी: हजारों स्थानीय प्रशंसकों की मायूसी के बीच आयोजन के प्रयोजन पर उठे कई सवाल

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 12 Mar 2023 06:07 AM IST

सार

अहमदाबाद के स्टेडियम में 1,30,000 लोग बैठ सकते हैं। भारत में टेस्ट मैच में शायद ही कभी तीस या चालीस हजार से अधिक की भीड़ होती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि आयोजक चाहते थे वहां किसी टेस्ट मैच में सर्वाधिक दर्शक का 'विश्व रिकॉर्ड' बने।
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नरेंद्र मोदी-एंथनी अल्बानीज - फोटो : ANI


2009 में सचिन तेंदुलकर नरेंद्र मोदी से अधिक लोकप्रिय थे, एक ब्रैंड नाम से बढ़कर थे और घर-घर में उनका नाम जाना-पहचाना था। सचिन के साथ जुड़ने का लाभ यह था कि उससे प्रचार अच्छा मिलता। अब जरा चार साल आगे बढ़कर अक्तूबर, 2013 पर आते हैं। मोदी ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर अपने अभियान की शुरुआत की ही थी और इस उद्यम में वह खुद को एक जीवित महान क्रिकेटर के बजाय एक दिवंगत महान राजनेता से जोड़ना चाहते थे। इसीलिए सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशाल प्रतिमा के निर्माण की योजना बनी। अपने अभियान के दौरान भाषणों में मोदी ने दावा किया कि पटेल जवाहरलाल नेहरू से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते और यदि ऐसा होता, तो भारत शुरुआत से एक सुरक्षित, मजबूत और कहीं अधिक आत्मनिर्भर देश होता।


2009 में नरेंद्र मोदी को थोड़े समय के लिए सचिन तेंदुलकर से अपनी पहचान जोड़ने की जरूरत हुई थी। 2013-14 में उन्हें उससे भी थोड़े समय के लिए सरदार पटेल से खुद को जोड़ने की जरूरत पड़ी। सात साल और आगे बढ़कर मार्च 2021 पर आते हैं। अंतरिम रूप से, नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को लगातार दो आम चुनावों में जीत दिलाई। वह अब पूरी तरह से अपनी ही तरह के आदमी हैं, उनकी छवि को मजबूत करने में किसी अन्य भारतीय का सहयोग नहीं है,- न तो उनके पूर्व गुरु लालकृष्ण आडवाणी का, न ही उनके पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का, यहां तक कि उनके पूर्व नायक सरदार पटेल का भी नहीं।


सचिन तेंदुलकर को नरेंद्र मोदी द्वारा स्मृति चिह्न भेंट करते हुए देखने के साढ़े ग्यारह साल बाद मैंने लाखों अन्य भारतीयों के साथ, एक बार फिर टेलीविजन पर सरदार पटेल स्टेडियम में एक अन्य टेस्ट मैच को शुरू होते देखा था। सिवाय इसके कि यह अब सरदार पटेल स्टेडियम नहीं रह गया था। टेस्ट (इंग्लैंड के विरुद्ध) मैच शुरू होने से पहले भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति ने, जिनकी बगल में भारत के गृहमंत्री खड़े थे, एक पट्टिका का अनावरण किया, जिससे हमें पता चला कि कभी जिस स्टेडियम का नाम उस भारतीय के नाम पर था, नरेंद्र मोदी जिनका गुणगान करते थे, उसे बदलकर मोदी के नाम पर कर दिया गया है।


इसके साथ ही मोदी उन नेताओं की कतार में शामिल हो गए, जिनके सत्ता में रहते हुए अपने नाम से स्टेडियम रहे। यह नहीं सोचा गया था कि 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र' के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों के साथ खड़े होना चाहेंगे। फिर भी, कहा जा सकता है कि मोदी स्पष्ट रूप से इस सम्मान से बिल्कुल भी असहज नहीं थे। बीते बृहस्पतिवार को उन्होंने अपने नाम के स्टेडियम में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के साथ मैच देखते हुए नया इतिहास रच दिया। मुझे नहीं पता कि क्या मुसोलिनी ने तुरीन के स्टेडियम में, कोई फुटबॉल मैच देखा था, जो कि कभी उनके नाम पर था, या कभी स्टालिन ने मॉस्को में उनके नाम वाले स्टेडियम में कभी एथलीट प्रतिस्पर्धा देखी थी।


एक भारतीय लोकतंत्रवादी के रूप में मैंने मोदी के व्यक्तित्व के विकास को निराशा के साथ देखा है। इसके विस्तार का यह आखिरी उदाहरण एक क्रिकेट प्रशंसक के रूप में मेरी संवेदनाओं को भी आहत करता है। ऐसा लगता है कि गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (जीसीए) ने खेल के पहले दिन टिकटों की खुले बाजार में बिक्री रोक दी, ताकि उनका राजनीतिक संपर्कों के जरिये वितरण हो सके और नरेंद्र मोदी स्टेडियम में प्रधानमंत्री का उनके सबसे समर्पित अनुयायी स्वागत कर सकें।


मुझे इसके बारे में मेरे एक दोस्त ने बताया जो कि टेस्ट देखने के लिए अहमदाबाद जाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने पाया कि आम लोगों के लिए दूसरे दिन से ही टिकटों की बिक्री होगी। टिकट बुक करने वाली वेबसाइट्स से पता चला कि पहले दिन की कोई टिकट उपलब्ध नहीं है। मेरे दोस्त ने पाया कि उनके एक सहयोगी ने भक्त कोटे से एक टिकट हासिल कर लिया था। यहां तक कि ऑस्ट्रेलियाई प्रशंसक भी पहले दिन का टिकट हासिल नहीं कर सके।
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इस पर पीटर लालोर ने द ऑस्ट्रेलियन में अपनी रिपोर्ट में लिखा, 'पहले दो टेस्ट मैच पूरे तीन दिन भी नहीं हो सके, ऐेसे में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी देखने के लिए भारत आए सैकड़ों ऑस्ट्रेलियाई लोगों को निराशा हुई। दसियों हजार स्थानीय प्रशंसक भी मायूस थे।' लालोर ने यह भी लिखा, भारतीय प्रधानमंत्री 'इवेंट मैनेजमेंट' के लिए बदनाम हैं। लालोर की रिपोर्ट के बाद, ऑस्ट्रेलियाई राजनयिकों ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से पैरवी की और उसके बाद ही ऑस्ट्रेलिया से भारत आने वाले कई सौ क्रिकेट प्रशंसकों को टिकट बेचने के लिए अब एक विशेष बूथ खोला गया। लेकिन हजारों भारतीय प्रशंसकों के लिए लिखने वाला कोई नहीं है। भारत में क्रिकेट मीडिया व्यापक रूप से बाकी मीडिया की तरह ही है, जो कि बीसीसीआई को नाराज नहीं करना चाहता, जिसका मौजूदा प्रबंधन सत्तारूढ़ दल के एक अंग की तरह ही काम कर रहा है।


अहमदाबाद के स्टेडियम में 1,30,000 लोग बैठ सकते हैं। भारत में टेस्ट मैच में शायद ही कभी तीस या चालीस हजार से अधिक की भीड़ होती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि आयोजक चाहते थे कि न केवल वहां मोदी को पूजने वाली भीड़ हो, बल्कि वे किसी टेस्ट मैच में सर्वाधिक दर्शक का 'विश्व रिकॉर्ड' भी बनाना चाहते थे, जो कि अभी मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (एमसीजी) के नाम है।


बीसीसीआई के उलट क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया सत्ताधारी दल के नेताओं का दास नहीं है। एमसीजी में टेस्ट मैच देखने के लिए आने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक वास्तविक क्रिकेट प्रशंसक रहा है; वहां कोई भी किसी राजनीतिक रैली में शामिल होने नहीं आया। ( ध्यान दें, मोदी के अहमदाबाद में मैदान छोड़ने के एक घंटे के भीतर, भीड़ तेजी से कम हो गई।)


मैच शुरू होने से पहले मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष ने सुनहरी बग्घी में मैदान का चक्कर लगाया और भीड़ का अभिवादन किया। प्रधानमंत्री को उनके एक करीबी राजनीतिक सहयोगी के बेटे ने एक तोहफा दिया; कैमरों ने जूम कर दिखाया कि नरेंद्र मोदी स्टेडियम में नरेंद्र मोदी को नरेंद्र मोदी की पेंटिंग भेंट की गई। मैच के दौरान डिस्पले बोर्ड में एक दृश्य में दोनों प्रधानमंत्री नजर आए जिसमें मोदी का कद ऊंचा दिख रहा था, जबकि वह वास्तव में तीन इंच छोटे हैं। मुझे आश्चर्य है कि एंथनी अल्बनीज इस पर क्या सोच रहे थे; क्या वह आत्ममोह के इस शानदार प्रदर्शन में अतिरिक्त बनकर खुश थे?


वास्तव में, अहमदाबाद के इस टेस्ट की मेजबानी करने का कोई कारण नहीं था। यह शहर कोलकाता की तुलना में क्रिकेट के मामले में पिछड़ा है, पिछले तीन वर्षों में जिसे कोई टेस्ट मैच नहीं मिला है। भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया के लिए अहमदाबाद से अधिक मजबूत दावे चेन्नई, बेंगलुरू और मुंबई के थे। केवल गुजरात में ही व्यक्तित्व पंथ को पर्याप्त रूप से संतुष्ट किया जा सकता था। कभी महान कहा जाने वाला और अब भ्रष्ट हो चुका क्रिकेट का खेल इसका वाहक बन गया।

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