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मकान मालिक होने का सुख

Thu, 30 Apr 2015 08:04 PM IST
ओमप्रकाश मंजुल
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दुनिया में यों तो अनेक प्रकार के सुख हैं, पर जो सुख मकान मालिक बनने में है, वैसा और किसी में नहीं। मकान मालिक चाहे दो कौड़ी का आदमी हो और किरायेदार दो करोड़ का, तब भी मकान मालिक किरायेदार के सामने ऐसे पेश आता है, जैसे अंग्रेज भारतीयों से पेश आते थे। मकान मालिक और किरायेदार का साथ वैसा ही होता है, जैसे नदी के ऊंचे तट पर खड़े शेर और निचले तट पर दुबकी हुई बकरी का होता है। शेर की तरह मकान मालिक अकारण ही किरायेदार से कह सकता है, तुमने नल की टोंटी खराब कर दी, बाथरूम गंदा कर डाला, आदि-आदि।
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किरायेदार से बेगार लेना तो मकान मालिक का विशेषाधिकार है। जैसे जनसेवक बनते ही व्यक्ति कई संस्थाओं में पदेन अधिकारी बन जाता है, वैसे ही मकान मालिक बनते ही कई प्रकार की सुविधाएं एवं अधिकार फ्री में मिल जाते हैं। मसलन, मकान मालिक किरायेदार की फैमिली की ताक-झांक कर सकता है, किरायेदार के हिस्से वाले आंगन में कोयले की अंगीठी सुलगा सकता है, किरायेदार के गांव से आए गुड़, गन्ना, मूंगफली, आम-अमरूद-पपीते का फ्री में सेवन कर सकता है। यही नहीं, किरायेदार के भरोसे अपना मकान छोड़कर पंद्रह-बीस दिनों के लिए कहीं भी जा सकता है। उस दौरान बेचारा किरायेदार रात भर जागकर मकान की रखवाली इतनी तन्मयता से करता है कि भले ही उसके यहां चोरी हो जाए, पर मकान मालिक का पोर्शन सुरक्षित रहे। एक बार मकान मालिक मुझ पर बिगड़ गया। मैंने कहा, भाई साहब, मैं तो अपने मकान की तरह इसका ध्यान रखता हूं। फिर क्या था! उसने मकान खाली करने का नोटिस भेज दिया। उसकी आशंका थी कि अगर मैं उसके मकान को अपना मकान समझने लगा हूं, तो इस पर कब्जा करने का भी इरादा पाल सकता हूं।

मकान मालिक से टकराकर तो बंदा फिर भी कुछ दिन किरायेदार बनकर रह सकता है, पर मकान मालकिन से पंगा लेने का अर्थ है, तत्काल मकान खाली करना। इन्हीं सब वजहों से अब मैं भी मकान मालिक बनने के ख्वाब देख रहा हूं।
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