भारत में बाजार के ऐतिहासिक अवलोकन से शुरू होकर वैश्वीकरण के बाद आई व्यापक तब्दीलियों पर नजर डालती इस किताब को पढ़ने के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञाता होने की जरूरत नहीं है। इसमें बाजार के आरंभिक विकास, विविध संस्कृतियों और इतिहास को उसकी विविधताओं में समेटा गया है।
पहले ही अध्याय में लिखा गया है कि ज्यादातर नीतिगत फैसले बाजार को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं, जिससे इस पुस्तक की दिशा तय हो जाती है। बाजार की आरंभिक अवस्था का क्रमवार और बेहद शोधपरक वर्णन है। इसके अलावा विभिन्न नगरों और उनके व्यावसायिक महत्व को विस्तार से बताया गया है। बाजार के इतिहास को बताते-बताते यह पुस्तक भूगोल के बारे में भी काफी कुछ बता जाती है।
बाजार को समझाने के लिए लेखकों ने अनेक संदर्भों का सहारा लिया है, मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत की कुछ पंक्तियों के जरिये इंडो-मुस्लिम बाजार और तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन है। इसके अलावा विभिन्न प्रसंगों से यह बताने की कोशिश की गई है कि बाजार का दर्शन शुद्ध लाभ-हानि पर टिका होता है।
वहां कोई नैतिकता, मर्यादा, आदर्श और संबंध काम नहीं आते हैं। यह तथ्य ऐतिहासिक बाजारों के लिए भी सत्य था और आज भी सत्य है। पुस्तक में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समेटने के साथ ही वैश्वीकरण के बाद के बाजार पर भी फोकस किया गया है। लेकिन बाकी कालखंडों की तुलना में वैश्वीकरण के बाद वाले खंड को कम जगह दी गई है।