विगत 28 अप्रैल को ऐतिहासिक लोकसभा चुनाव के कई चरण समाप्त हो चुके थे। चुनाव परिणाम के बारे में ज्यादा मतभेद नहीं था। केवल मोदी जी कितनी सीटों का बहुमत पाएंगे, इसी बात का फैसला नहीं हो पा रहा था। उनकी इस अप्रत्याशित जीत के कई कारण गिनाए जा रहे थे। मीडिया की भूमिका, कांग्रेस की नाकामी इत्यादि-इत्यादि, लेकिन एक बात पर तमाम विशेषज्ञ और नव-उदारवादी दौर के बुद्धिजीवी सबसे ज्यादा जोर दे रहे थे कि मोदी जी द्वारा दिए गए 'विकास' के नारे ने जातिगत मतभेदों और दरारों को समाप्त कर दिया था, और जातिवादी राजनीति और भावनाओं की समाप्ति का अंत चुनाव के नतीजों के साथ ही होने वाला था। ऐसा होता, तो कितना अच्छा होता, पर महाराष्ट्र के खर्दा गांव (जिला अहमदाबाद) में 28 अप्रैल की घटना कुछ और ही बता रही है।
उस दिन खर्दा गांव में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले 17 वर्षीय नितिन आगे को उसके स्कूल के परिसर में तीन लोगों ने बुरी तरह से मारा। हेडमास्टर साहब ने इस दृश्य को खामोशी के साथ देखा, और फिर मारने वालों से कहा कि लड़के को स्कूल के बाहर ले जाकर उसके साथ जो कुछ भी करना है, कर लो। तो नितिन को वे लोग अपने ईंट के भट्ठे पर ले गए। वहां हथौड़े से उसके हाथ-पैर को तोड़ने के बाद, उसका गला घोंट दिया और शव को पेड़ पर लटका दिया।
नितिन का कसूर यह था कि उसकी दोस्ती स्कूल में पढ़ने वाली एक मराठा जाति की लड़की से थी। यह बात लड़की के परिजनों के गले नहीं उतर पा रही थी। उन्होंने दो-एक बार नितिन को स्कूल में मारा भी, पर दोनों की दोस्ती नहीं टूटी। इसका नतीजा यह हुआ कि 28 अप्रैल को लड़की का भाई अपने मामा और एक दोस्त के साथ स्कूल पहुंचा और तीनों ने नितिन की नृशंस हत्या कर दी।
नितिन के माता-पिता दलित हैं। जाहिर है, वे बहुत ही गरीब हैं। पहले वे गन्ना काटने का काम करते थे, और उनके रहने का कोई ठिकाना नहीं था। अपने बच्चों को पढ़ाने के इरादे से वे खर्दा की दलित बस्ती में रहने लगे और ईंट के भट्ठों में काम करते थे। 28 तारीख को नितिन जब घर नहीं लौटा, तो उन्होंने पुलिस को सूचना दी। इसके बाद ही उसकी लाश पेड़ पर लटकी हुई मिली। पहले तो उसकी मौत को 'आत्महत्या' बताने की कोशिश की गई, फिर उसे आवेश में हुई गलती में बदलने की कोशिश शुरू हो गई। कई दलित संगठनों और माकपा के हस्तक्षेप के बाद हत्या और एससी/एसटी कानून के उल्लंघन का एफआईआर दर्ज किया गया।
लड़की की जाति का ही महाराष्ट्र की राजनीति में वर्चस्व है। बड़े नेताओं की तरफ से हत्यारों को बचाने की कोशिश की जा रही है। इलाके के दलित परिवार ज्यादातर भूमिहीन मजदूर हैं, जिनका गुजारा ऊंची जातियों की मर्जी से होता है। इस घटना ने उनके अंदर आक्रोश तो बहुत पैदा किया, लेकिन उसको व्यक्त करने की हिम्मत और क्षमता उत्पन्न नहीं कर पाए। नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष की लहर पैदा करने का प्रयास था, 'चलो खर्दा' पदयात्रा, जिसका आयोजन दलित-आदिवासी संगठन, माकपा और जनवादी महिला समिति इत्यादि ने किया। इस पदयात्रा की शुरुआत 22 मई को खर्दा गांव में हुई। पदयात्रा को देखने और उसमें भाग लेने वालों को सुनने के लिए सैकड़ों लोग इकट्ठा होते थे। रात में गांवों में बड़ी सभाएं होतीं। बड़ी संख्या में महिलाओं ने हमदर्दी जताई।
28 मई को खर्दा में पदयात्रा की समाप्ति एक बड़ी आम सभा के साथ हुई। नितिन के परिवार के लोग भी आस-पास मौजूद थे। जिस लड़की के लिए नितिन ने अपनी जान गंवाई, उसका तो अता-पता नहीं है। हमारे देश की करोड़ों अदृश्य लड़कियों और महिलाओं की भीड़ में वह भी अपने अधूरे सपनों और संपूर्ण पीड़ा को लेकर गुम हो गई है।
देश का नया दौर शुरू हो गया है। उसको नितिन तो नहीं देख पाया। उसके जैसे औरों का क्या हश्र होगा, इसी सवाल के जवाब में इस दौर की हकीकत छिपी हुई है।