लीजिए, बेचारी सरकार को फिर से बदनाम किया जा रहा है। वह तो संविधान के भूले-बिसरे प्रावधानों को चलाकर देख रही थी कि चलते भी हैं या नहीं। कहीं बेकार पड़े-पड़े जाम तो नहीं हो गए। और विपक्ष वालों ने खामखा शोर मचा दिया कि संविधान के साथ खिलवाड़ कर रही है। राष्ट्रपति शासन के नाम पर अरुणाचल पर अपनी तानाशाही लाद रही है। लोकतंत्र की हत्या कर रही है और न जाने क्या-क्या?
हमारे देश में लोकतंत्र की हत्या का शोर ‘भेड़िया आया’ के शोर जैसा है। शोर हर दिन मचता है, भेड़िया आता कभी नहीं है। वैसे भी अगर किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने से लोकतंत्र की जान जाती, तो जाने कब की जा चुकी होती। फिर इत्ता-सा तो अरुणाचल है और उसकी डेमोक्रेसी तो पूछिए ही मत। उसके गिरने के धक्के का तो देश को पता तक नहीं चलेगा।
विपक्ष वाले जब खुद गद्दी पर थे, तब उन्होंने खूब राष्ट्रपति शासन लगाए थे। अब दूसरों की बारी आई है, तो हल्ला करने लगे। यह तो जनतांत्रिक खेल भावना नहीं हुई। वैसे हमें तो लगता है कि सरकार ने अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन सिर्फ अपना वचन पूरा करने के लिए लगाया है। खुद प्रधानमंत्री ने कहा था कि पूरे का पूरा संविधान उनके सिर माथे है। सरकार तो सिर्फ शगुन करके राष्ट्रपति शासन लगाने की व्यवस्था के सामने आपना सिर झुकाना चाहती है।
वैसे भी अगर विरोध करना विपक्ष का धर्म है, तो सरकार का भी धर्म उसे अपने धर्म का पालन करने का मौका देना है। सरकार अगर आज उसे यह मौका नहीं देती, तो कल को यही विपक्ष वाले उस पर शासक के धर्म का पालन न करने के तीखे आरोप लगाते। रही बात विरोधियों के शोर से डरने की, तो यह सरकार किसी से डरती नहीं है। वैसे भी यह परंपरा का मामला है और परंपरा के पालन पर सरकार समझौता हर्गिज नहीं करेगी, चाहे मंदिर में दलितों, महिलाओं को देवता से दूर रखने की परंपरा हो या चुनी हुई सरकार को कुर्सी से दूर करने की।