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कतार में खड़े लोग

Wed, 14 Dec 2016 07:17 PM IST
सुरेंद्र कुमार
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सुरेंद्र कुमार
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किसी भी समझदार व्यक्ति को इससे आपत्ति नहीं होगी कि काला धन उसी तरह देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाता है, जैसे कैंसर मानव शरीर को। कैंसर का अगर समय पर इलाज नहीं किया गया, तो उसका मरीज पर क्या असर होगा, यह स्पष्ट है। यदि काले धन के उत्पादन, प्रसार, उपयोग और जमाखोरी को नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो यह अर्थव्यवस्था का नाश कर सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री के कट्टर विरोधी भी अपने निजी पलों में यह स्वीकार करेंगे कि पांच सौ और हजार रुपये के नोटों को अमान्य करने की उनकी घोषणा एक साहसिक और कल्पनाशील पहल थी। जिस जोश, जुनून और विश्वास के साथ उन्होंने लोगों से डिजिटल भुगतान को अपनाने की अपील की, वह उनके साहसिक कदम की गंभीरता बताता है। उन्होंने अपनी इतनी राजनीतिक पूंजी दांव पर लगा दी है कि विफल होना बर्दाश्त नहीं कर सकते।
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लेकिन सेना नायक चाहे कितना ही साहसिक और बहादुर क्यों न हो, अगर उसकी पैदल सेना लड़ाई के लिए तैयार नहीं है, यदि उसके पास रसद नहीं है और यदि सैनिकों के पास जरूरी हथियार और पर्याप्त गोला-बारूद नहीं हंै, तो एक बड़ी लड़ाई जीतना उसके लिए चमत्कार से कम नहीं है। 'सर्जिकल' घोषणा के एक महीने बाद बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लंबी अंतहीन कतार, अपनी गाढ़ी कमाई में से घर चलाने के लिए छोटी-सी रकम निकालने गए करीब सौ लोगों की घंटों कतार में खड़े रहने के कारण मौत, हजारों लघु एवं मध्यम उद्योगों को भारी नुकसान, अनियोजित क्षेत्र के लाखों लोगों के सामान्य जीवन में बाधा और हर दिन नई-नई घोषणाएं बताती हैं कि इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के बारे में नहीं सोचा गया था। इस फैसले के क्रियान्वयन संबंधी विभिन्न जरूरतों की गंभीरता और प्रक्रिया संबंधी अपरिहार्य खामियों से निपटने के बारे में नहीं सोचा गया। लगता है कि प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकार जनरल सुंदरजी के नक्शेकदमों पर चलते हैं, जिन्होंने माना जाता है कि इंदिरा गांधी को सलाह दी थी कि स्वर्ण मंदिर में एक भी गोली चलाए बिना भिंडरवाले को वहां से बाहर निकाला जा सकता है और राजीव गांधी से दावा किया कि श्रीलंका में तमिल टाइगर्स को छह हफ्ते में सबक सिखाया जा सकता है! क्या हुआ, यह इतिहास है। देश को सुंदरजी की अवास्तविक 'सोच' और सरलीकृत आकलन की भारी कीमत चुकानी पड़ी।

आम लोगों के जीवन की मुश्किलों और अनगिनत कठिनाइयों को मामूली असुविधा बताना सबसे बड़ी निर्दयता और असंवेदनशीलता है! जो लोग कतारों में खड़े रहने के कारण मर गए, क्या उनकी मां, पत्नी और बच्चे नहीं हैं? बेशक वे सीमा पर नहीं लड़ रहे थे, पर वे जिंदा रहने और प्रियजनों का समर्थन करने की लड़ाई लड़ रहे थे। क्या आम लोगों के जीवन का कोई मतलब नहीं है?
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नोटबंदी ने देश में ध्रुवीकरण में एक और पहलू जोड़ा है। जिस किसी ने भी आम लोगों की दुर्दशा पर प्रकाश डालने और इस फैसले के औचित्य तथा क्रियान्वयन की प्रभावकारिता पर सवाल उठाने की कोशिश की, उसे गैर देशभक्त और काले धन का समर्थक बताया गया! क्या नोटबंदी के आक्रामक समर्थकों का ही ईमानदारी, बुद्धिमत्ता और देशभक्ति पर एकाधिकार है? आसपास के चापलूस लोगों से कोई फायदा नहीं होने वाला है, बल्कि विपरीत विचारों को सुनने से ही मदद मिल सकती है। बहस और रचनात्मक आलोचना को खारिज करना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

नोटबंदी के समर्थक और आलोचक, दोनों आधा सच ही बोलते हैं। यह सही है कि वित्तीय लेन-देन जितना ज्यादा डिजिटल होगा, उतनी ही पारदर्शिता आएगी, भ्रष्टाचार और काले धन पर अंकुश लगेगा, आतंकवाद और उग्रवाद के लिए धन का प्रवाह रुकेगा और दीर्घकालीन अर्थों में अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह दावा करना कि इससे भ्रष्टाचार और काला धन खत्म हो जाएगा या गरीब लोग अमीर हो जाएंगे और हर जगह विशाल इन्फ्रॉस्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, स्वास्थ्य सेवा केंद्र तथा शैक्षणिक संस्थान खुल जाएंगे, बिल्कुल गलत है।

जब तक सभी राजनीतिक दल ईमानदारी के प्रति प्रतिबद्धता नहीं जताएंगे, अपने खातों को डिजिटाइज नहीं करेंगे, जब तक सारा चंदा चेक या कार्ड के जरिये नहीं लेंगे और खुद को सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं लाएंगे, राजनीतिक दलों के चंदे को कानूनी जामा नहीं पहनाया जाएगा और व्यापक चुनावी सुधार नहीं किया जाएगा, तब तक नोटबंदी की सफलता संदेहास्पद रहेगी।

स्टांप शुल्क, कॉरपोरेट और व्यक्तिगत आयकर की दरें और सोना के आयात पर शुल्क घटाकर काले धन के उत्पादन, प्रसार और जमाखोरी को कम किया जा सकता है। सफेद धन के उपयोग को प्रोत्साहन देकर काले धन के खिलाफ लड़ने के लिए सबसे प्रभावी उपाय है। लेकिन बीमा पॉलिसियों पर छूट को छोड़कर और जितने भी आकर्षक प्रस्ताव वित्त मंत्री ने दिए हैं, उससे बहुत फायदा नहीं होने वाला है। जिस देश में करीब आधी आबादी डिजिटल उपकरणों को नहीं अपना रही है, वहां सवा अरब की आबादी को डिजिटाइज करने की बात करना गलत ही कहा जाएगा। वास्तव में लाखों किसानों, छोटे व्यवसायियों, हॉकरों और दिहाड़ी मजदूरों को अपना काम-धाम छोड़कर रोज-रोज कतार में खड़े रहने के लिए बाध्य करना अनुत्पादक है। नोटबंदी ने आगरा के जूता उद्योग, इलाहाबाद के केला बाजार, हैदराबाद के पाल्ट्री फार्म, बंगलूरू के रेशम उद्योग को काफी नुकसान पहुंचाया है। पिछले एक महीने में देश में लगभग चार लाख रोजगार का नुकसान हुआ है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लोग पांच घंटे पैदल चलकर नजदीक के शहरों में पहुंचते हैं, जहां एक मात्र बैंक और एटीएम है। कई लोग कई चक्कर लगाने के बावजूद बैंक या एटीएम से पैसे निकालने में सक्षम नहीं हुए। दुखद है कि नोटबंदी के चलते आम आदमी को अतिरिक्त नुकसान हुआ है। हमें गरीब लोगों के दर्द की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उसका गुस्सा ताकतवरों को भी ध्वस्त कर देता है।
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