हर पांच साल पर मतदान की घोषणा से मतगणना की अवधि तक के हे अल्पकालिक भगवान, आपको कोटिशः प्रणाम। बड़े-बड़े तुर्रम खां आप जैसों को आपके प्राइम टाइम में करते हैं दंडवत प्रणाम। इस सीजन में आपको खुश करने की कोशिश में वे कुछ भी कर सकते हैं। तमिलनाडु में देखिए, अखबारों में देने के बजाय अब टिफिन बॉक्स में भगवानों को दक्षिणा दे रहे हैं यजमान, ताकि चुनाव में कृपा बनी रहे। कुछ बंदे आपकी बाईं ओर से बाहें फैलाए खडे हैं, तो कुछ दाईं ओर से। लेकिन आप न बाएं गए और न दाएं। चौराहे पर खड़े ललचाई दृष्टि से ताक रहे हैं आसमान पर लटके बैनरों की ओर, कि कब इस धमाचौकड़ी का हो द एंड। फिर बैनरों की लूट शुरू हो और आप दो बैनरों का बनवा सकें कच्छा-बनियान।
कहते हैं, बारह वर्ष में तो घूरे के दिन भी फिरते हैं। इस दृष्टि से आप अगड़े हैं कि आपके दिन तो हर पांच वर्ष में बहुरते हैं। आप चिलचिलाती धूप में सिकते/भुनते हैं, मूसलाधार बारिश के दौरान कुठरियों में पानी से तर-बतर होते हैं और कंपकंपाती ठंड में अपने फटे कंबल में बैठे दांत किटकिटाते हैं। कभी सपरिवार वोट डालने जाते भी हैं, तो मतदान केंद्र से निराश ही लौटते हैं। वहां बैठी मैडम कहती है कि आपका नाम तो वोटर लिस्ट में है ही नहीं। आधार कार्ड, विभागीय आईडी सब व्यर्थ हैं।
हे अभावों में पले हुए लोग, कभी राजनेता, विचारक और लेखक आपकी चिंता में दुबले होते रहते थे। आजकल वे एसी में बैठकर चिंता की चिता में जल रहे हैं। मेरे एक धनी मित्र सात सौ रुपये के नौ आम लाए, अल्फांसो प्रजाति के। आम आदमी कभी एक-दो रुपये किलो आम खाकर पेट भर लेता था। आज महंगाई मैडम की अनुकंपा से आम ने सेब को भी पछाड़ दिया है। इसलिए बदले हुए दौर में आम आदमी को मैंगो पीपल कह देने से काम नहीं चलेगा। आम आदमी वह है, जो पीटता कम है, पिटता ज्यादा है। आम आदमी वह है, जो घसीटता कम है, घिसटता ज्यादा है। आम आदमी वह है, जो जीतता कम है, हारता ज्यादा है।