हम भारत के लोगों ने खुद को भारत का संविधान दिया है। संविधान सभा की स्थापना एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत के आधार पर नहीं की गई थी, और इसलिए यह सही में लोगों की प्रतिनिधि नहीं थी। फिर भी अंत में जो हासिल हुआ, उसके आधार पर आकलन करें तो संविधान सभा ने भारत के सभी लोगों की बात की। हमारा संविधान इमरजेंसी (1975-77) या समय से पूर्व केंद्र सरकार के गिर जाने (1979-80) जैसी परिस्थितियों में उत्पन्न भीषण तनाव के समय लचीला बना रहा है; और कई संशोधनों के बावजूद अपना बुनियादी ढांचा खोए बिना यह कायम है।
नानी पालकीवाला ने जब यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि संविधान के मूल ढांचे के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या संशोधन नहीं किया जा सकता, तो अनेक विद्वानों और कानूनी विशेषज्ञों ने उनके इस तर्क का उपहास उड़ाया था। उन्होंने सवाल किया कि आखिर कैसे संविधान (अनुच्छेद 368) को संशोधित करने के संसद के संप्रभु अधिकार को सीमित किया जा सकता है या फिर कैसे कार्यपालिका द्वारा नियुक्त न्यायाधीश इसकी समीक्षा कर सकते हैं। आखिर में बेंच में शामिल 13 में से सिर्फ सात जजों ने पालकीवाला के उस समय के अनूठे तर्क के साथ सहमति जताई थी। आज हम कह सकते हैं कि उनका शुक्रिया कि उन्होंने वह तर्क माना।
सबके लिए न्याय कहां?
भारत के संविधान ने अपने सभी नागरिकों के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करने का संकल्प लिया है। इनमें से प्रत्येक पदबंध, उदाहरण के लिए सामाजिक न्याय, के गहरे अर्थ हैं। इन पदबंधों ने लाखों दिलों में महत्वाकांक्षा की ज्वाला प्रज्वलित की है और कर रही है। 26 जनवरी, 2020 को हम संविधान की 70वीं वर्षगांठ मनाएंगे।
यही ठीक समय है कठोर सवाल करने का किसे सामाजिक न्याय मिला और किसे नहीं मिला? आर्थिक न्याय क्या है और क्या सभी नागरिकों को आर्थिक न्याय मिल गया? यहां तक कि जब सारे नागरिकों के पास एक राजनीतिक वोट है, तो क्या सबको राजनीतिक न्याय मिल गया?
शताब्दियों से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग सबसे निचले तबके में हैं। अन्य पिछड़ी जातियां और उनमें भी अत्यंत पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक अन्य वंचित वर्ग हैं। अमेरिका में अश्वेत सौ साल से भी अधिक समय तक उसी स्थिति में रहे, जैसी स्थिति में भारत में आज दलित, आदिवासी और मुस्लिम हैं। दासता को खत्म करने के लिए गृहयुद्ध हुआ और 1963 में सिविल राइट्स एक्ट पारित होने के बाद ही वहां स्वीकार्यता, अफरमेटिव एक्शन और समान अवसर उपलब्ध कराने की लंबी प्रक्रिया शुरू हुई।
भारत में हमारे पास संविधान है, जो कि छुआछूत पर रोक लगाता है, धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को गैरकानूनी बनाता है और एस तथा एसटी को आरक्षण उपलब्ध कराता है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा (मानव विकास सूचकांक के अन्य घटकों के अलावा) तक पहुंच और सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के संदर्भ में सामाजिक न्याय अब भी उपेक्षित तबकों की पहुंच से दूर है।