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आधे लोगों का गणतंत्र

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 05 Jan 2020 01:13 AM IST
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भारतीय संविधान

हम भारत के लोगों ने खुद को भारत का संविधान दिया है। संविधान सभा की स्थापना एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत के आधार पर नहीं की गई थी, और इसलिए यह सही में लोगों की प्रतिनिधि नहीं थी। फिर भी अंत में जो हासिल हुआ, उसके आधार पर आकलन करें तो संविधान सभा ने भारत के सभी लोगों की बात की। हमारा संविधान इमरजेंसी (1975-77) या समय से पूर्व केंद्र सरकार के गिर जाने (1979-80) जैसी परिस्थितियों में उत्पन्न भीषण तनाव के समय लचीला बना रहा है; और कई संशोधनों के बावजूद अपना बुनियादी ढांचा खोए बिना यह कायम है।

नानी पालकीवाला ने जब यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि संविधान के मूल ढांचे के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या संशोधन नहीं किया जा सकता, तो अनेक विद्वानों और कानूनी विशेषज्ञों ने उनके इस तर्क का उपहास उड़ाया था। उन्होंने सवाल किया कि आखिर कैसे संविधान (अनुच्छेद 368) को संशोधित करने के संसद के संप्रभु अधिकार को सीमित किया जा सकता है या फिर कैसे कार्यपालिका द्वारा नियुक्त न्यायाधीश इसकी समीक्षा कर सकते हैं। आखिर में बेंच में शामिल 13 में से सिर्फ सात जजों ने पालकीवाला के उस समय के अनूठे तर्क के साथ सहमति जताई थी। आज हम कह सकते हैं कि उनका शुक्रिया कि उन्होंने वह तर्क माना।



सबके लिए न्याय कहां?
भारत के संविधान ने अपने सभी नागरिकों के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करने का संकल्प लिया है। इनमें से प्रत्येक पदबंध, उदाहरण के लिए सामाजिक न्याय, के गहरे अर्थ हैं। इन पदबंधों ने लाखों दिलों में महत्वाकांक्षा की ज्वाला प्रज्वलित की है और कर रही है। 26 जनवरी, 2020 को हम संविधान की 70वीं वर्षगांठ मनाएंगे।

यही ठीक समय है कठोर सवाल करने का किसे सामाजिक न्याय मिला और किसे नहीं मिला? आर्थिक न्याय क्या है और क्या सभी नागरिकों को आर्थिक न्याय मिल गया? यहां तक कि जब सारे नागरिकों के पास एक राजनीतिक वोट है, तो क्या सबको राजनीतिक न्याय मिल गया?

शताब्दियों से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग सबसे निचले तबके में हैं। अन्य पिछड़ी जातियां और उनमें भी अत्यंत पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक अन्य वंचित वर्ग हैं। अमेरिका में अश्वेत सौ साल से भी अधिक समय तक उसी स्थिति में रहे, जैसी स्थिति में भारत में आज दलित, आदिवासी और मुस्लिम हैं। दासता को खत्म करने के लिए गृहयुद्ध हुआ और 1963 में सिविल राइट्स एक्ट पारित होने के बाद ही वहां स्वीकार्यता, अफरमेटिव एक्शन और समान अवसर उपलब्ध कराने की लंबी प्रक्रिया शुरू हुई। 

भारत में हमारे पास संविधान है, जो कि छुआछूत पर रोक लगाता है, धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को गैरकानूनी बनाता है और एस तथा एसटी को आरक्षण उपलब्ध कराता है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा (मानव विकास सूचकांक के अन्य घटकों के अलावा) तक पहुंच और सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के संदर्भ में सामाजिक न्याय अब भी उपेक्षित तबकों की पहुंच से दूर है।

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भारतीय संविधान
हम भारत के लोगों ने खुद को भारत का संविधान दिया है। संविधान सभा की स्थापना एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत के आधार पर नहीं की गई थी, और इसलिए यह सही में लोगों की प्रतिनिधि नहीं थी। फिर भी अंत में जो हासिल हुआ, उसके आधार पर आकलन करें तो संविधान सभा ने भारत के सभी लोगों की बात की। हमारा संविधान इमरजेंसी (1975-77) या समय से पूर्व केंद्र सरकार के गिर जाने (1979-80) जैसी परिस्थितियों में उत्पन्न भीषण तनाव के समय लचीला बना रहा है; और कई संशोधनों के बावजूद अपना बुनियादी ढांचा खोए बिना यह कायम है।

नानी पालकीवाला ने जब यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि संविधान के मूल ढांचे के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या संशोधन नहीं किया जा सकता, तो अनेक विद्वानों और कानूनी विशेषज्ञों ने उनके इस तर्क का उपहास उड़ाया था। उन्होंने सवाल किया कि आखिर कैसे संविधान (अनुच्छेद 368) को संशोधित करने के संसद के संप्रभु अधिकार को सीमित किया जा सकता है या फिर कैसे कार्यपालिका द्वारा नियुक्त न्यायाधीश इसकी समीक्षा कर सकते हैं। आखिर में बेंच में शामिल 13 में से सिर्फ सात जजों ने पालकीवाला के उस समय के अनूठे तर्क के साथ सहमति जताई थी। आज हम कह सकते हैं कि उनका शुक्रिया कि उन्होंने वह तर्क माना।

सबके लिए न्याय कहां?
भारत के संविधान ने अपने सभी नागरिकों के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करने का संकल्प लिया है। इनमें से प्रत्येक पदबंध, उदाहरण के लिए सामाजिक न्याय, के गहरे अर्थ हैं। इन पदबंधों ने लाखों दिलों में महत्वाकांक्षा की ज्वाला प्रज्वलित की है और कर रही है। 26 जनवरी, 2020 को हम संविधान की 70वीं वर्षगांठ मनाएंगे।

यही ठीक समय है कठोर सवाल करने का किसे सामाजिक न्याय मिला और किसे नहीं मिला? आर्थिक न्याय क्या है और क्या सभी नागरिकों को आर्थिक न्याय मिल गया? यहां तक कि जब सारे नागरिकों के पास एक राजनीतिक वोट है, तो क्या सबको राजनीतिक न्याय मिल गया?

शताब्दियों से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग सबसे निचले तबके में हैं। अन्य पिछड़ी जातियां और उनमें भी अत्यंत पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक अन्य वंचित वर्ग हैं। अमेरिका में अश्वेत सौ साल से भी अधिक समय तक उसी स्थिति में रहे, जैसी स्थिति में भारत में आज दलित, आदिवासी और मुस्लिम हैं। दासता को खत्म करने के लिए गृहयुद्ध हुआ और 1963 में सिविल राइट्स एक्ट पारित होने के बाद ही वहां स्वीकार्यता, अफरमेटिव एक्शन और समान अवसर उपलब्ध कराने की लंबी प्रक्रिया शुरू हुई। 

भारत में हमारे पास संविधान है, जो कि छुआछूत पर रोक लगाता है, धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को गैरकानूनी बनाता है और एस तथा एसटी को आरक्षण उपलब्ध कराता है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा (मानव विकास सूचकांक के अन्य घटकों के अलावा) तक पहुंच और सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के संदर्भ में सामाजिक न्याय अब भी उपेक्षित तबकों की पहुंच से दूर है।

गरीबों से भेदभाव

मैंने आवास, अपराध, विचाराधीन मामलों और खेल में प्रतिनिधित्व इत्यादि से संबंधित डाटा नहीं लिए हैं, जो कि निर्णायक तरीके से साबित करेंगे कि एससी, एसटी और मुस्लिम सामाजिक रूप से भेदभाव का शिकार हैं और उन्हें उपेक्षा, अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है।

आर्थिक न्याय सामाजिक न्याय से ही पैदा होता है। उपेक्षित और वंचित तबकों तक शैक्षणिक पहुंच कम होती है, उनके पास कम संपत्ति होती है, बहुत थोड़ी सी सरकारी नौकरियां या गुणवत्ता वाले काम होते हैं और उनकी आय/खर्च भी कम होते हैं, जैसा कि नीचे टेबिल में दिए गए आंकड़े दिखाते हैंः

सबसे बुरी त्रासदी
राजनीतिक न्याय का तीसरा वादा सबसे बुरी त्रासदी साबित हुआ है। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की मेहरबानी से एससी और एसटी के लिए राज्य विधानसभा तथा संसद सहित निर्वाचित संस्थाओं में उचित अनुपात में सीटें आरक्षित हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि राजनीतिक न्याय यहां आकर खत्म हो जाता है। अनेक राजनीतिक दलों में निर्णय लेने वाले संगठनों या उस स्तर तक एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व प्रतीकात्मक ही है। यहां तक कि यदि अनूसूचित जातियों ने अपनी खुद की पार्टियां (बसपा, वीसीके) बनाई भी तो उनका समर्थन आधार एससी वोटों तक ही सीमित रहता है, जब तक कि वे व्यापक सामाजिक गठबंधन (बहुजन) या राजनीतिक गठजोड़ न कर लें, वे वहीं अटकी रहती हैं। 

अल्पसंख्यकों के मामले में खासतौर से मुस्लिमों की स्थिति बेहद खराब है। मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ हैं, लेकिन वे शायद ही कभी पार्टी के अग्रिम नेताओं में शामिल हो पाते हैं। भाजपा सार्वजनिक रूप से मुस्लिमों को नकारती है और उन्हें एनआरसी-सीएए-एनपीआर के नाम पर धमकाती है। दूसरी ओर मुस्लिमों द्वारा खड़ी की गई आईयूएमएल या एआईएमआईएम जैसी पार्टियां गठबंधन की सहयोगी हो सकती हैं या फिर रुकावट पैदा कर सकती हैं, लेकिन विजेता कभी नहीं बन सकतीं।

मुस्लिमों के केंद्रीय मुद्दों को बहुत कम समर्थन मिलता है या फिर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ता है। जम्मू और कश्मीर के मामले को ही लीजिए। मुझे ऐसा लगता है कि कश्मीर घाटी में रहने वाले 75 लाख लोगों का मुद्दा तेजी के साथ परिदृश्य से गायब हो रहा है। घाटी (जो कि सिकुड़ कर आधा केंद्र शासित क्षेत्र रह गई है) पांच अगस्त से घेरेबंदी में है। 2019 में आतंकवादी घटनाएं एक दशक में नई ऊंचाइयों तक पहुंच गईं। मारे गए और घायल हुए नागरिकों की संख्या की भी यही स्थिति है। 

609 लोग अब भी हिरासत में हैं, जिनमें बिना आरोपों के तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। मीडिया की 'रिपोर्ट्स' 'सब कुछ सामान्य' बताने वाला सरकारी पुलिंदा रह गई हैं। ऐसा लगता है कि देश के बाकी लोग कश्मीरी लोगों को भूलकर दूसरी चिंताओं में लिप्त हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2019 में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। 

हर रोज संविधान का उल्लंघन कर लाखों लोगों को न्यूनतम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय से वंचित किया जाता है। जहां तक जम्मू और कश्मीर की चिंता की बात है, तो यह सांविधानिक कलंक का मामला है, लेकिन हमें अदालत का फैसला आने तक इंतजार करना होगा। सत्तर वर्ष बाद, सभी नागरिकों को जिस न्याय का वादा किया गया था, वह कम से कम आधे नागरिकों के लिए उपलब्ध नहीं है और जिन आधे लोगों को यह उपलब्ध भी है, तो वह टुकड़ों में है।
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