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बंगाल के लोगों ने बदलाव को चुना है: कभी नवजागरण की दिशा दिखाई, अब सत्ता परिवर्तन के साथ नई उम्मीदें जगाई

तस्लीमा नसरीन
Updated Tue, 12 May 2026 08:21 AM IST

सार

बंगाल ने कभी नवजागरण की दिशा दिखाई थी, उदार चिंतन का साहस दिया था। उसी बंगाल के लोगों ने सत्ता परिवर्तन के साथ नई उम्मीदें जगाई हैं। चुनाव के नतीजों की बांग्लादेश के कट्टरपंथी समूहों द्वारा आलोचना उनके दोहरेपन का ही नमूना है।
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Mamata Banerjee - फोटो : PTI


लोगों में यह धारणा भी बनी कि उद्योग-धंधे, रोजगार और स्थायी विकास पर जोर देने के बजाय लाभार्थी योजनाओं के जरिये वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश की गई। 'लक्ष्मी भंडार' या दूसरी योजनाओं से असंख्य लोगों को लाभ मिलने के बावजूद ममता के विरोधी इसका प्रचार करने में सफल हुए कि विकास के बजाय लाभार्थी योजनाओं के जरिये वोटों की खरीद की राजनीति चल रही है।


सरकारी कर्मचारी भी तृणमूल सरकार से नाराज थे। महंगाई भत्ते के लिए आंदोलन, नौकरी से जुड़े असंतोष और प्रशासन से दूरी ने अनेक शिक्षित, मध्यवर्गीय वोटरों को तृणमूल का विरोधी बना दिया था। सत्ताधारी दल के आतंक, बूथों पर कब्जे, विरोधियों पर हमले और चुनावी अराजकता के आरोपों के कारण लोगों में लोकतंत्र के प्रति क्षोभ और अनास्था की भावना बढ़ रही थी। महिलाओं की असुरक्षा, बलात्कार और स्त्री शोषण के मामलों में प्रशासन की भूमिका से भी लोगों में क्षोभ था। सबसे बड़ी बात कि लोगों के एक वर्ग की यह धारणा बन गई थी कि ममता बनर्जी अब पहले की तरह योद्धा नेत्री नहीं रहीं। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण उनके चारों तरफ व्यक्तिपूजा, अति केंद्रीकरण और सत्ता के अहंकार का वातावरण तैयार हुआ है। इतिहास में कई बार यह देखा गया है कि कोई सरकार तभी हारती है, जब जनता को लगने लगता है कि सत्तासीन सरकार अब उनकी बातें नहीं सुन रही। प. बंगाल में इस बार इस धारणा ने बड़ी भूमिका निभाई है।


एक समय था, जब बंगाल की पहचान सिर्फ एक भूखंड के तौर पर नहीं, बल्कि एक बौद्धिक सभ्यता के रूप में थी। बंगाल चिंतन और नवजागरण का केंद्र था। राजा राममोहन राय, विवेकानंद, रवींद्रनाथ और सुभाषचंद्र से लेकर सत्यजित राय और महाश्वेता देवी तक बंगाल में प्रतिभाओं की कतार रही है। बंगाल के लेखक, कलाकार सत्ता के अन्याय का विरोध करते थे। रवींद्रनाथ ने अंग्रेजों की 'नाइटहुड' उपाधि लौटा दी थी, सत्ता का विरोध कर नजरुल जेल गए थे। आज का बंगाल क्या उसके अनुरूप है? अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर भी बंगाल में क्षोभ था। अनेक लोगों की धारणा थी कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण को बढ़ावा दिया गया। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, मंदिरों में तोड़-फोड़, घरों और जमीनों पर जबरन कब्जे की खबरें लगातार पश्चिम बंगाल पहुंचती रहीं। इस कारण पश्चिम बंगाल के अनेक हिंदुओं में मौलवियों की संख्या और उनके असर में हुई वृद्धि के कारण यह आशंका पैदा हुई कि राजनीतिक हित साधने के लिए कट्टरवाद को बढ़ावा देने से सामाजिक संतुलन नष्ट होगा। हिंदुओं में व्याप्त यह आतंक सच हो या अतिरंजित-चुनाव में इसका असर पड़ा हो, तो आश्चर्य नहीं।


दूसरी ओर, बांग्लादेश के कट्टरवादी समूहों ने भाजपा की बंगाल विजय को 'हिंदुत्व की जीत' बताते हुए आलोचना की है। यह उनके दोहरेपन का ही नमूना है। पृथ्वी के ज्यादातर ईसाई, यहूदी या हिंदू बहुसंख्यक देशों ने खुद की धर्मनिरपेक्ष छवि बनाई है। जबकि अनेक मुस्लिम बहुल देशों में इस्लाम ही राष्ट्रधर्म है। यह दोहरापन मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण में रोड़ा है।


पश्चिम बंगाल के लोगों ने एक दिन वाम शासन को सत्ता से हटाया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण माकपा के नेतृत्व में वाम मोर्चा का आम जनता से कोई संबंध नहीं रह गया है। उद्योग-धंधों के मोर्चे पर उदासीनता, पार्टीतंत्र और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का आरोप लगाकर जनता ने वाम मोर्चे को हटाया था। उस जनक्षोभ के जरिये तृणमूल परिवर्तन के वादे के साथ सत्ता में आई थी। लेकिन समय के साथ-साथ अनेक लोगों की नजरों में तृणमूल भी उसी रास्ते पर चलने लगी थी। फर्क सिर्फ यह था कि उसने इन मामलों में ज्यादा दुस्साहस और आक्रामकता का परिचय दिया। मैं खुद इस राजनीति का शिकार बनी थी। माकपा ने कट्टरवाद के खिलाफ लिखी मेरी किताबों पर प्रतिबंध लगाया और मुझे पश्चिम बंगाल छोड़ने के लिए भी मजबूर किया था। तृणमूल ने भी मुझे वहां रहने नहीं दिया। मेरी किताबों के कार्यक्रम बंद किए गए, मेरी रचनाओं पर आधारित टीवी धारावाहिक के प्रसारण पर रोक लगाई गई। यह सिर्फ एक लेखक पर हमला नहीं था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रश्न पूछने के अधिकार पर हमला था। मैं किसी राजनीतिक दल से जुड़ी नहीं हूं, न ही किसी दल की अंध समर्थक हूं। मेरा मानना है कि कोई भी पार्टी आलोचना के दायरे से बाहर नहीं है। जो अच्छा काम करेगी, उसकी प्रशंसा और जो गलत काम करेगी, उसका विरोध करना होगा। नागरिकों का पहला दायित्व किसी दल के प्रति अंधभक्ति के बजाय अपने विवेक को जगाए रखना है।  


लोगों ने चूंकि बदलाव की उम्मीदों से वोट दिया है, इसलिए उनकी उम्मीदें भी विराट हैं। वे चाहते हैं कि भ्रष्टाचार खत्म हो, भय के माहौल पर विराम लगे, प्रशासन निरपेक्ष हो, नौकरियों में पारदर्शिता आए, उद्योग और निवेश बढ़े, शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो। वे चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल एक बार फिर चिंतन, संस्कृति, कला, साहित्य एवं मानवीयता का उज्ज्वल दृष्टांत पेश करे। पर सिर्फ सरकार बदलने से समाज नहीं बदलता। समाज तब बदलता है, जब लोग खुद में बदलाव लाते हैं। पश्चिम बंगाल के सामने आज बड़ा सवाल है- क्या यह फिर अपने उदार, तार्किक और मानवतावादी स्वर्णिम दौर में लौटेगा या ध्रुवीकरण, घृणा और प्रतिशोध की राजनीति की ओर बढ़ेगा?
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बंगाल ने कभी नवजागरण की दिशा दिखाई थी, उदार चिंतन का साहस दिया था, साहित्य और संस्कृति की नई भाषा दी थी। उस बंगाल से लोगों को आज भी उम्मीदें हैं। ऐसे में, सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ राजनीतिक संस्कृति में बदलाव भी जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ, तो इतिहास खुद को दोहराने के लिए अभिशप्त होगा और बंगाल के लोग बार-बार ठगे जाते रहेंगे।
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