वैसे तो हर भारतीय नारी के अंदर दसेक ग्राम ‘मीना कुमारी’ होती है, लेकिन हमारे हिस्से में यह परसेंटेज कुछ ज्यादा ही है। बहुत इमोशनल हैं हमारी श्रीमतीजी। मैं लाख चाहूं कि वह खुद को टीवी सीरियल और मुफ्त के सिनेमा तक सीमित रखें, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें भी अखबार पढ़ने का चस्का लग गया है।
टीवी पर न्यूज के बजाय चार शास्त्रियों के शास्त्रार्थ के चलते उन्हें न्यूज में अब दिलचस्पी रही नहीं। अलबत्ता अखबार पढ़कर आंखों में पानी आने पर आंचल का सहारा वह प्रायः लेती हैं। महंगाई की खबर के लिए कहती हैं, मुर्दे का मुंह जितनी बार देखो, रुलाई आती है। भ्रष्टाचार की स्टोरी उन्हें अ-सत्यनारायण कथा सरीखी लगती है। लेकिन जब औरतों पर जुल्म और उनकी अस्मत से खिलवाड़ से जुड़ी खबरों पर वह अटक जाती हैं, तब उन्हें कन्विंस करना टेढ़ी खीर है। उन्हें समझाने के चक्कर में अक्सर मैं कन्फ्यूज हो जाता हूं।
उस दिन चाय का मग और घर की बनी मठरी के साथ बैठे हुए उन्होंने अखबार पटक दिया। उनका चेहरा नॉर्मल से अधिक लटका हुआ पहाड़ी चूहे-सा नजर आ रहा था। फ्रंट पेज सामने रखती हुई वह बोलीं, ये कानून-व्यवस्था को क्या हो गया है? यहां तो पुलिस अधिकारी तक सुरक्षित नहीं हैं।
पता नहीं क्यों, बंदे को भी ‘सैंया भए कोतवाल’ वाली कहावत अब बेमानी लग रही है। कहावत की भाव-भूमि पर विचरने से लगता था कि सैंया के कोतवाल हो जाने पर कम से कम एक अबला तो भयमुक्त विचर सकती रही होगी। पुरखों की इस कहावत को भी सुपुर्दे-खाक कर दिया गया। 'कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में' का आजकल न्योता देते महानायक कभी कहते थे, यूपी में है दम, क्योंकि यहां जरायम है कम। वह समझदार हैं, इसलिए समय रहते ही अपनी रोजी-रोटी उन्होंने शिफ्ट कर ली। सरकार का क्या, वह तो ऐसी सिचुएशन में भी स्थिति तनावपूर्ण, मगर नियंत्रण में है का दावा ठोंक देती है। जनता सदमे में है, तो रहे।
मेरा इमोशनल लेवल अर्द्धांगिनी से कम जरूर है, लेकिन मैं सोच रहा हूं कि इस महान देश में आदमी दुर्घटना से नहीं मरता, दुर्घटना से जीवित रहता है और जीवन पर्यंत दुर्घटना-ग्रस्त रहता है। नौकरी के दौरान मेरे आईएएस अधिकारी ने सहज पूछा था, जानते हैं, हम और आप जिंदा क्यों हैं? फिर उन्होंने खुद ही कहा, इसलिए कि आपको मारने वाला अभी आगे नहीं आया।