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जनादेश: जनता अपने मुद्दों पर चुनाव लड़ रही है, गवाह हैं हरियाणा के चुनावी नतीजे

नीरजा चौधरी
Updated Wed, 09 Oct 2024 04:35 AM IST

सार

हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुत ही चौंकाने वाले हैं, क्योंकि जितने भी एग्जिट पोल आए थे, उन सबने कांग्रेस के प्रचंड बहुमत से जीतने के अनुमान व्यक्त किए थे। लोगों को उन अनुमानों पर भरोसा भी हो रहा था, क्योंकि भाजपा दो कार्यकाल से वहां सत्ता में है।
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हरियाणा के कार्यवाहक सीएम नायब सैनी - फोटो : संवाद


हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुत ही चौंकाने वाले हैं, क्योंकि जितने भी एग्जिट पोल आए थे, उन सबने कांग्रेस के प्रचंड बहुमत से जीतने के अनुमान व्यक्त किए थे। लोगों को उन अनुमानों पर भरोसा भी हो रहा था, क्योंकि भाजपा दो कार्यकाल से वहां सत्ता में है। ऐसे में सत्ता विरोधी रुझान होना स्वाभाविक है, क्योंकि बेरोजगारी के कारण युवा परेशान हैं। लोग बात कर रहे थे कि इस बार जनता सत्ता परिवर्तन के लिए मतदान करेगी। हालांकि शहरी क्षेत्रों में भाजपा के लिए समर्थन बरकरार था। इसके बावजूद चुनावी नतीजों का बिल्कुल उलट जाना और कांग्रेस के बजाय भारतीय जनता पार्टी का लगातार तीसरी बार राज्य की सत्ता पर काबिज होना वाकई एक बड़ी बात है। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर रही। भाजपा को बिल्कुल स्पष्ट बहुमत मिला है।


हरियाणा में कहा जाता था कि आज तक किसी भी पार्टी की लगातार तीसरी बार सरकार नहीं बन पाई है, ऐसे में हरियाणा जैसे राज्य में लगातार तीसरी बार भाजपा का सरकार बनाना बहुत मायने रखता है। अभी तक गुजरात और मध्य प्रदेश में ऐसा देखा गया था, लेकिन इस बार हरियाणा में भी भाजपा ने इतिहास रच दिया है। इसके बावजूद कि लोगों की नाराजगी को देखते हुए पार्टी आलाकमान ने मनोहर लाल को हटा दिया और उनकी जगह पर कुछ महीने के लिए नायब सैनी को लाया गया और दलित कार्ड खेला गया, क्योंकि भाजपा नेतृत्व को सत्ता जाने का डर सता रहा था। लेकिन जैसा कि हर बार भाजपा चुनाव में करती है, इस बार भी दिग्गज पार्टी नेताओं को चुनाव प्रचार में उतार दिया गया। हालांकि प्रधानमंत्री खुद ज्यादा नहीं गए, लेकिन बाकी नेता लगातार राज्य में प्रचार कर रहे थे। ऐसा नतीजा तब आया है, जब जाट वोट बंटा नहीं है। वैसे हरियाणा में आम तौर पर जाट वोट बंटता रहा है, लेकिन इस बार जाट वोट पूरी तरह कांग्रेस के पाले में था और वे मुखर तथा आक्रामक थे। इसकी कई वजहें रही हैं, मसलन किसान आंदोलन, हरियाणा के पहलवानों के प्रति उदासीन रवैया आदि। इसके अलावा, पिछले दस साल से कोई जाट मुख्यमंत्री नहीं बना था और जाटों के हाथ से राजनीतिक शक्ति छीन ली गई थी, इसलिए भी जाट भाजपा से नाराज थे।


कहा जा रहा है कि जाट बहुल क्षेत्रों में भी कई सीटों पर भाजपा आगे रही है। इसका मतलब है कि सिर्फ जाट वोटों का ही कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण नहीं हुआ, बल्कि गैर-जाट वोटों का भी भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ है। इसके अतिरिक्त, आखिरी दिनों में दलित और ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा की तरफ रुख किया है, विशेष रूप से दलितों ने, जिसने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट दिया था और जिसके चलते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पांच सीटें मिली थीं। भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी अच्छा प्रदर्शन किया है। इसकी वजह है डर। मैं जब दलित बस्तियों में घूम रही थी, तो वहां दलितों ने कहा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो उसे गैर जाट नेता को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए, कुमारी सैलजा को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए। वे तो यहां तक कह रहे थे कि अगर कुमारी सैलजा को नहीं बनाते हैं, तो उदयभान को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए या अशोक तंवर को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए, क्योंकि ये भी दलित हैं, जबकि अशोक तंवर तो उस दिन दो घंटे पहले ही कांग्रेस में शामिल हुए थे। 


उन्होंने बताया कि उन्हें डर है कि कांग्रेस के जीतने पर जाटशाही वापस आ जाएगी। यह डर इस उलटफेर की एक वजह हो सकती है, हालांकि हरियाणा चुनाव के नतीजे का बारीकी से अध्ययन करने की जरूरत है, बहुत से लोग मान रहे थे कि यह परिवर्तन का चुनाव है, क्योंकि लोग बदलाव की बात कर रहे थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि वहां सत्ता विरोधी रुझान थे। जाट बनाम गैर जाट ध्रुवीकरण कई जमाने से हरियाणा में होता आया है। लेकिन इस बार जाट का ध्रुवीकरण मुखर था, जबकि गैर-जाटों का ध्रुवीकरण चुपचाप हुआ। और यह ध्रुवीकरण इतना व्यापक हुआ कि इसने ग्रामीण क्षेत्रों को भी प्रभावित किया।


आखिर इस जनादेश के जरिये हरियाणा की जनता क्या संदेश देना चाह रही है? दलित मतदाता मुखर हो रहे हैं। वे नहीं चाहते कि उन्हें अब पहले की तरह उत्पीड़ित किया जाए। उन्हें अपने वोट की ताकत का एहसास हो गया है। उन्होंने देखा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जब उन्होंने कांग्रेस का रुख किया, तो भाजपा अल्पमत में आ गई। अन्य कारण भी थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा के अल्पमत में आने का मुख्य कारण यही था कि दलित मतदाता कांग्रेस की तरफ झुक गए थे, और हरियाणा में दलित फिर भाजपा के खेमे में चले गए। कहने का मतलब है कि दलित और ओबीसी मतदाताओं को आप आज के समय में हल्के में नहीं ले सकते। चुनाव को संचालित करने में राजनीतिक दलों की अपनी जगह है, लेकिन आज जनता चुनाव को अपने ढंग से संचालित कर रही है। 


मुझे ऐसा लगता है कि जाट ने कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाई, तो दलित-ओबीसी ने हवा का रुख भाजपा की तरफ घुमा दिया। मैं मानती हूं कि हुड्डा और सैलजा के बीच अंदरूनी कलह का इस चुनाव पर असर पड़ा, लेकिन ऐसा नहीं है कि सैलजा दलित वोटो को बहुत ज्यादा ट्रांसफर कर सकती हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वह दलितों का एक प्रतीक बनकर उभरी है। दलितों में इस बात की भी नाराजगी हो सकती है कि दलितों के प्रतीक सैलजा को घर बिठा दिया गया, उन्हें और उनके प्रत्याशियों को भी चुनाव नहीं लड़ने दिया, नब्बे में से 72 टिकट हुड्डा ने बांटे। शायद दलितों की इस नाराजगी को भांपकर ही कांग्रेस ने अंतिम क्षण में अशोक तंवर को लाकर एक संकेत देने की कोशिश की, कि हम आपका ध्यान रखते हैं और आपके एक और दलित नेता हमारे साथ हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अगर भाजपा हरियाणा चुनाव हार जाती, तो आगे जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां विपक्ष की तरफ वोटों का रुझान होता और भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती। लेकिन अब उस पर विराम लग गया है। 
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