हिमालय की गोद में बसा भारतीय उपमहाद्वीप आज प्रकृति के एक ऐसे प्रकोप के मुहाने पर खड़ा है, जिसकी बानगी हाल ही में नेपाल और तिब्बत की सीमा पर देखने को मिली है, जहां अचानक आई घातक बाढ़ ने सैकड़ों जिंदगियों को निगल लिया। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह तबाही ग्लेशियर के टूटने, तापमान में वृद्धि और पर्वतीय अस्थिरता का परिणाम थी। यह भारत के लिए एक गंभीर और अंतिम चेतावनी है। जम्मू-कश्मीर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अत्यंत तीव्र गति से दिखाई दे रहा है। कश्मीर यूनिवर्सिटी के पृथ्वी विज्ञान विभाग और विभिन्न शोध संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र के ग्लेशियर अभूतपूर्व दर से सिकुड़ रहे हैं। तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण कश्मीर घाटी में अनियंत्रित ढंग से ‘ग्लेशियल झीलें’ बन रही हैं, जिनके फटने का खतरा बढ़ गया है। यदि समय रहते इन झीलों के जलस्तर की निगरानी नहीं की गई, तो झेलम बेसिन के आसपास बसे घनी आबादी वाले इलाके जलमग्न हो सकते हैं। कश्मीर के सामने केवल जलवायु और जल प्रबंधन का ही संकट नहीं है, बल्कि इसके ऊपर भूकंपीय खतरा भी लगातार मंडरा रहा है। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा जारी 2025 के राष्ट्रीय भूकंपीय जोनिंग मानचित्र में समूचे हिमालयी चाप को, जिसमें जम्मू-कश्मीर भी शामिल है, अब भारत की सर्वाधिक खतरनाक श्रेणी ‘जोन VI’ में रखा गया है। उत्तराखंड का भूगोल इस समय सबसे अधिक संवेदनशील और खतरे में है।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और अन्य वैज्ञानिक संगठनों के अनुसार, उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 1,000 से अधिक छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें बन चुकी हैं, जिनमें से कई ‘फ्लैश फ्लड’, यानी अचानक बाढ़ का कारण बनने के लिए तैयार हैं। यही स्थिति हिमाचल प्रदेश की घाटियों में भी विकराल रूप धारण कर चुकी है। सतलुज, ब्यास और चेनाब नदी घाटियों में लगातार बढ़ रहे तापमान ने बर्फ पिघलने की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है। हिमाचल प्रदेश के राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र के आंकड़े गवाही देते हैं कि राज्य में पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक वर्षा, बादल फटने और अचानक बाढ़ आने की घटनाओं में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण नई झीलों का निर्माण हुआ है, जिनके प्राकृतिक बांध बेहद कमजोर हैं। नदियों के मुहानों और फ्लडप्लेन क्षेत्रों में हो रहे निर्माण कार्यों ने इस खतरे को और अधिक घातक बना दिया है।
इसलिए जलवायु, जलविज्ञान, जैवविविधता और जल गुणवत्ता की दीर्घकालिक निगरानी को एक साथ जोड़कर हर प्रमुख ग्लेशियर झील के लिए ठोस प्रबंधन योजना तैयार करना जरूरी है। ऐसी नीतियों को ठोस नीति, निरंतर निगरानी, सख्त भवन संहिता और सामुदायिक भागीदारी में बदलना ही एकमात्र रास्ता है, जो हिमालय के इस क्रंदन को समय रहते सुन सके।