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असली मुद्दों पर ध्यान दीजिए

तवलीन सिंह Updated Sun, 26 Nov 2017 07:12 PM IST
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तवलीन सिंह
काश कि भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों को चिंता संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती की कम और अपने-अपने प्रदेशों में सुशासन लाने की ज्यादा होती। काश, उनको यह दिखाई देता कि उनका दायित्व किसी एक समुदाय के तथाकथित गौरव को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि मतदाताओं के हित सुरक्षित रखना है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश बुनियादी विकास के मामले में दशकों से इतने पिछड़े हुए रहे हैं कि उनकी गिनती बीमारू राज्यों में होती है। बीमारू इसलिए कि इन राज्यों में विकास के हर मोर्चे पर शर्मनाक स्थिति दिखाई पड़ती है। इन राज्यों में स्वास्थ्य-शिक्षा सेवाएं विकसित राज्यों की तुलना में बदतर हैं। इन राज्यों के बच्चे एक वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले ही ऐसी बीमारियों से मर जाते हैं, जिनके इलाज उपलब्ध हैं। इन राज्यों में गरीबी रेखा के नीचे करोड़ों लोग ऐसे जीवन व्यतीत करते हैं, जिसे देख विकसित राज्यों के लोग हैरान रह जाते हैं।


सारा दोष केवल भाजपा की सरकारों का नहीं है। बल्कि असली दोष तो कांग्रेस के उन पूर्व मुख्यमंत्रियों का है, जिनका दशकों से इन राज्यों में राज रहा है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन राज्यों में भाजपा की सरकारें जब बनी थीं, तब उन्हें आम लोगों का दिल से समर्थन इसलिए मिला, क्योंकि लोग कुशासन के लंबे दौर से तंग आ चुके थे। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान बेशक नरेंद्र मोदी के ‘परिवर्तन-विकास’ वाले नारे से पहले विधानसभा का चुनाव जीते हों, लेकिन राजस्थान  और उत्तर प्रदेश में क्रमशः वसुंधरा राजे और योगी आदित्यनाथ भारी बहुमत से न जीत पाते, अगर मोदी के परिवर्तन और विकास वाले नारे की गूंज न होती। उत्तर प्रदेश में तो विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पद के लिए योगी आदित्यनाथ का नाम भी घोषित नहीं किया गया था।


भाजपा की सत्ता वाले इन राज्यों में परिवर्तन और विकास अगर आंधी की तरह आया होता, तो थोड़े दिन के लिए पद्मावती को लेकर  हंगामे पर आपत्ति नहीं होती। पर सच यह है कि भाजपा शासित राज्यों में भी परिवर्तन और विकास उतना ही धीरे से आ रहा है, जितना धीरे कांग्रेस के दौर में आया करता था। इन मुख्यमंत्रियों को हिंदू गौरव की अगर इतनी ही चिंता है,  तो वे उन चीजों और मुद्दों में अपना ध्यान केंद्रित क्यों नहीं करते, जिनसे वास्तव में हिंदू गौरव को चार चांद लग सकते हैं?


दक्षिण भारत के ऐसे कई राज्य हैं, जहां परिवर्तन और विकास के नारे के बगैर परिवर्तन और विकास तूफान बनकर आया है। ऐसा उत्तर भारत में क्या इसलिए नहीं हुआ है, क्योंकि यहां लोगों को गलत मुद्दों पर भड़काया जाता है? कभी मंदिर-मस्जिद के झगड़े को लेकर, कभी जात-पांत को लेकर, तो कभी आरक्षण को लेकर राजनेता लोगों को सड़कों पर उतर आने के लिए उकसाते हैं। क्या ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि भाजपा प्रशासनिक तरीकों से परिवर्तन लाने में विफल रही है?


इन सवालों के जवाब मतदाता अगला साल शुरू होते ही मांगने लगेंगे, सो उत्तर भारत के मुख्यमंत्रियों को अगर दोबारा सत्ता हासिल करने की इच्छा है, तो बेहतर होगा कि वे भंसाली की पद्मावती को भूलकर उन मुद्दों पर ध्यान दें, जिनके लिए उन्होंने वोट मांगे थे। अफसोस कि भाजपा के एक भी मुख्यमंत्री ने अभी तक उन क्षेत्रों में सुधार लाने का प्रयास नहीं किया है, जिन क्षेत्रों में सुधार होने से इस देश के आम आदमी के जीवन में सुधार आएगा।
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