फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उन लड़कियों को बचाया जा सकता था

Sun, 01 Jun 2014 12:49 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी
विज्ञापन
विज्ञापन
आखिर इन दोनों में आप संवेदनशील मामला किसे कहेंगे? सूबे के एक मंत्री के फार्महाउस से उनकी भैंसों का गुम जाना या फिर आधी रात को शौच के लिए गई दलित परिवार की दो किशोरियों का लापता हो जाना? लोग भूले नहीं हैं, जब इसी वर्ष समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री आजम खान के फार्म हाउस से उनकी सात भैंसें चोरी हो गई थीं, तब किस तरह फौरन रामपुर पुलिस हरकत में आ गई थी। इसके उलट पिछले हफ्ते बदायुं में हुई जघन्य घटना के बाद पुलिस बेरुखी से पेश आई। रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना के बाद पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है।
विज्ञापन


रिश्ते में बहन 14 और 15 बरस की इन दलित लड़कियों को अगवा कर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर इन दोनों के शव बदांयु जिले के कटरा गांव में एक पेड़ से लटके मिले। यदि पुलिस समय पर हरकत में आ जाती, तो इन दोनों बच्चियों को बचाया जा सकता था। उनके घर पर शौचालय नहीं था, जिससे उन्हें शौच के लिए बाहर जाना पड़ता था। उनमें से एक के पिता ने इन बच्चियों को तलाशने के लिए पुलिस से गुहार भी की, मगर थाने में तैनात पुलिसकर्मी उन लड़कियों को ढूंढने के लिए राजी नहीं हुए और उन्होंने उसकी रिपोर्ट दर्ज करने से भी इन्कार कर दिया। अगले दिन सुबह, घर के नजदीक ही आम के पेड़ पर उनके शव लटके पाए गए। शव परीक्षण से पता चला कि दोनों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था और उनका गला घोंट दिया गया।

चौतरफा दबाव पड़ने के बाद आखिरकार सूबे की समाजवादी पार्टी सरकार ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें दो पुलिस वाले भी हैं। इस घटना की त्वरित अदालत से जांच कराए जाने की बात भी हो रही है। मगर बीमारी तो पूरी व्यवस्था में है, जहां किसी पुलिस कर्मी की पदोन्नति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके इलाके में कितने कम मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा पुलिस पर जाति के आधार पर आरोपियों को संरक्षण देने का भी मामला भी है। इस मामले में गिरफ्तार एक पुलिस जवान पर जाति के आधार पर आरोपियों को बचाने के भी आरोप हैं।
विज्ञापन


बदायुं में हुई इस जघन्य घटना पर विचार करते समय हमें ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह की यह कोई अकेली घटना नहीं है। यह घटना सिर्फ यह स्मरण कराती है कि भारत के पुरुष प्रधान और जाति आधारित समाज में दलित, खासतौर से इस समुदाय की महिलाएं और लड़कियां आज भी कितनी असुरक्षित हैं और उन्हें कितनी आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। सांविधानिक गारंटी और कानूनों के बावजूद दलित महिलाएं जाति, वर्ग और लिंग के तिहरे बोझ तले दबी हुई हैं। अफसोस की बात यह है कि देश का राजनीतिक वर्ग का बड़ा हिस्सा इसे कोई गंभीर समस्या नहीं मानता। इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हैरत जताई की आखिर पत्रकार इस घटना को लेकर इतना शोर-शराबा क्यों मचा रहे हैं, जबकि उनकी सुरक्षा को तो कोई खतरा नहीं है। उनके पिता और समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने हाल ही में एक चुनावी रैली में बलात्कारियों को मौत की सजा दिए जाने का विरोध किया था। उन्होंने कहा था, 'लड़के तो लड़के होते हैं, उनसे गल्तियां हो जाती हैं।'

मगर इसी हफ्ते, उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में खड़ी नजर आई, जब मुलायम सिंह यादव के अपने लोकसभा क्षेत्र में सामूहिक बलात्कार की एक घटना सामने आई। यही नहीं, यादव परिवार का गढ़ माने जाने वाले इटावा में एक बलात्कार पीड़िता की मां के साथ बलात्कार के आरोपी के पिता द्वारा मारपीट किए जाने का मामला भी सामने आया है।

हालांकि दलितों के उत्पीड़न की समस्या सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। तब फिर क्या किया जाना चाहिए? इससे जुड़े बुनियादी सवालों पर ध्यान देने की जरूरत है। जैसा कि आल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की नम्रता डेनियल कहती हैं कि ऐसे मामलों के ब्यौरों को बारीकी से देखने की जरूरत है। वह कहती हैं, 'असली संघर्ष तो न्याय पाने का है। पुलिस अमूमन प्राथमिकी दर्ज करने को ही तैयार नहीं होती। और जब एफआईआई दर्ज करने को राजी भी हो जाए तो वह कड़े प्रावधान वाले अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति उत्पीड़न निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने में आनाकानी करती है।'

इस अधिनियम के तहत पीड़ित मुआवजे के साथ ही अन्य तरह की मदद के हकदार होते हैं। इसमें मुआवजे की राशि बीस हजार रुपये लेकर दो लाख रुपये तक है। मगर जैसा कि डेनियल ने कहा, मुआवजे की राशि हासिल करना एक बड़ी चुनौती है। इसके बिना पीड़ित और उसका परिवार अक्सर अपने संघर्ष और कानूनी लड़ाई को आगे जारी नहीं रख पाते। दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स (पीवीसीएचआर) के लेनिन रघुवंशी कहते हैं कि सरकार को एक राज्य स्तर के नोडल अधिकारी के साथ ही संवेदनशील जिलों में नोडल अधिकारी की नियुक्ति करनी चाहिए जोकि ऐसे मामलों में रिपोर्ट दर्ज करे जिन्हें पुलिस रफा-दफा करने की कोशिश करती है। असल में पुलिस सुधार को भी प्राथमिकता में रखने की जरूरत है।

समाज की इसमें क्या भूमिका हो सकती है? यह समझने की जरूरत है कि ऐसे अपराध सजा या दंड से बच निकलने की संस्कृति के कारण होते हैं। सामाजिक-आर्थिक पैमाने पर सबसे निचले तबके पर मौजूद दलित अक्सर भयभीत होते हैं और खुद पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते। शुरुआती गुस्से के बाद समाज से उठने वाली आवाजें भी ठंड पड़ जाती हैं। लोगों का ध्यान धीरे-धीरे संबंधित घटना से हटकर कहीं और चला जाता है। बदायुं की घटना एहसास करा रही है कि इस जड़ता को तोड़ने की जरूरत है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें